अध्याय-3
सामाजिक संस्थाएँ-निरन्तरता एवं परिवर्तन [Social Institutions-Continuity and Change]
महत्वपूर्ण बिन्दु
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पाठान्त प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. जाति व्यवस्था में पृथक्करण (Separation) और अधिक्रम (Hierarchy) की क्या भूमिका है?
उत्तर- भारतीय समाज में जाति व्यवस्था में पृथक्करण और अधिक्रम ही महती भूमिका है। क्योंकि इनके माध्यम से प्रत्येक जाति का अलग अस्तित्व तथा प्रत्येक वर्ग का समाज में विशेष स्थान का पता चला है। पृथक्करण (Separation ) – जाति व्यवस्था का पहला सिद्धान्त भिन्नता व अलगाव पर आधारित होता है। प्रत्येक जाति एक-दूसरे से भिन्न है तथा इस पृथकता का कठोरता से पालन किया जाता है। इस तरह के प्रतिबन्धों में विवाह, खान-पान तथा सामाजिक अन्तर्संबन्ध से लेकर व्यवसाय तक शामिल हैं। सभी जातियाँ एक-दूसरे से पूर्णतया पृथक् होती हैं परन्तु इनका अस्तित्व सम्पूर्ण जाति-व्यवस्था के कारण ही सम्भव है। अधिक्रम (Hierarchy) – जाति व्यवस्था का दूसरा सिद्धान्त सम्पूर्णता और अधिक्रम पर आधारित है। अधिक्रम का अर्थ है- प्रत्येक वर्ग अथवा जाति का समाज में विशेष स्थान होता है। यह एक सीढ़ीनुमा व्यवस्था है। प्रत्येक जाति के बीच कुछ अन्तर होते हैं। ये अन्तर शुद्धता तथा अशुद्धता पर आधारित होते हैं। वे जातियाँ जिन्हें कर्मकांड की दृष्टि से शुद्ध माना जाता है। उनका स्थान उच्च होता है और जिन जातियों को अशुद्ध समझा जाता है उन्हें निम्न स्थान प्राप्त होता है। इस अधिक्रम में उच्च स्थान ब्राह्मणों को, फिर क्षत्रियों को, फिर वैश्यों को तथा सबसे अन्तिम स्थान शूद्रों को प्राप्त होता है।
प्रश्न 2. वे कौन-से नियम हैं जिनका पालन करने के लिए जाति व्यवस्था बाध्यm ‘करती है? कुछ के बारे में बताइए ।
उत्तर- जाति व्यवस्था के द्वारा समाज पर आरोपित सर्वाधिक सामान्य नियम निम्नलिखित हूँ-
(1) समाज के प्रत्येक व्यक्ति की जाति उसके जन्म के आधार पर ही निश्चित हो जाती है। व्यक्ति अपनी जाति का निर्धारण स्वयं नहीं कर सकता। जन्मजात जाति में हो उसे ताउम्र बितानी होती है।
(2) जाति के सदस्यों को खान-पान के नियमों का पालन करना होता है।
(3) जाति की सदस्यता के साथ विवाह सम्बन्धी कठोर नियम शामिल होते हैं। जाति समूह सजातीय होते हैं तथा विवाह समूह के सदस्यों के साथ ही हो सकते हैं।
(4) जाति प्रथा में व्यक्ति उस जाति से जुड़े व्यवसाय को ही अपना सकता था। जैसे- लुहार, बढ़ई, नाई, कुम्हार इत्यादि को अपने परम्परागत कार्यों को ही करना होता था।
(5) जाति में स्तर तथा स्थिति का अधिक्रम होता है। समाज को कई भागों में बाँटा गया था और हर हिस्से के सदस्यों का दर्जा, स्थान और कार्य निश्चित कर दिए गए थे।
(6) जातियों का उपविभाजन भी होता था। जाति प्रथा में अनुलोम विवाह को भी स्वीकृति प्राप्त थी।
प्रश्न 3. उपनिवेशवाद के कारण जाति व्यवस्था में क्या-क्या परिवर्तन आए ?
उत्तर- औपनिवेशिक शासनकाल के समय जाति व्यवस्था में निम्नलिखित प्रमुख परिवर्तन आए-
(1) सर्वेक्षण एवं जनगणना करना- अंग्रेज प्रशासकों ने देश पर कुशलतापूर्वक शासन करने के उद्देश्य से जाति व्यवस्था की जटिलताओं को समझने के प्रयत्न शुरू किए। 1860 के दशक में महत्त्वपूर्ण सरकारी प्रयत्न प्रारम्भ हुए। सन् 1901 में हरबर्ट रिजले के निर्देशन में जनगणना की गई जिसके माध्यम से सामाजिक अधिक्रम के बारे में जानकारी एकत्रित करने का प्रयत्न किया।
(2) भूमि की बन्दोबस्ती – भू-राजस्व बंदोबस्ती तथा अन्य कानूनों ने उच्च जातियों के जाति आधारित अधिकारों को वैध मान्यता प्रदान करने का कार्य किया। बड़े पैमाने पर सिंचाई की योजनाएँ प्रारम्भ की गई तथा लोगों को बसाने का कार्य प्रारम्भ किया गया।
(3) समाज सुधार-उपनिवेशकाल में कई भारतीय समाज-सुधारकों ने काम शुरू किए जिसका मुख्य उद्देश्य जाति प्रथा को समाज से खत्म करना था। निम्न जातियों के कल्याण, अन्तर्जातीय विवाह, विधवा-विवाह तथा बाल-विवाह को समाप्त करने के लिए कानून बनाए गए।
(4) व्यवसायों में विविधता – पूँजीवाद और आधुनिकता के प्रसार के कारण नए-नए उद्योगों को जन्म मिला, लोगों ने अपनी पसन्द तथा योग्यता के अनुसार कार्य करने शुरू किए। परम्परागत व्यवसायों के प्रतिबन्ध में भी कमी आई।
प्रश्न 4. किन अर्थों में नगरीय उच्च जातियों के लिए जाति अपेक्षाकृत ‘अदृश्य’ हो गई?
उत्तर- स्वतन्त्रता के पश्चात् राष्ट्र की विकासात्मक नीतियों का लाभ शहरी मध्यम वर्ग तथा उच्च वर्ग को मिला। इन समूहों के लिए विकास के समस्त संसाधन उपलब्ध थे और जातिगत अवस्था के कारण इन वर्गों ने भरपूर आर्थिक तथा शैक्षणिक संसाधनों का पूरा-पूरा लाभ उठाया। प्रौद्योगिकी, चिकित्सा तथा प्रबन्धन के क्षेत्र में, व्यावसायिक शिक्षा से लाभान्वित हुए। स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रारम्भिक दशकों में राजकीय क्षेत्र की नौकरियों में हुए विस्तार ने भी विशेषाधिकार की स्थिति प्राप्त की। नगरीय उच्च जातियों को यह विश्वास हो गया कि उनकी प्रगति का जाति से कुछ लेना-देना नहीं है। उनकी आर्थिक व शैक्षणिक पूँजी उन्हें जीवन के सर्वोत्तम अवसर देती रहेगी। इस कारण इन समूहों में सार्वजनिक जीवन में जाति का महत्त्व धीरे-धीरे सीमित हो गया। जाति अब केवल धार्मिक रीति-रिवाज, नातेदारी के व्यक्तिगत क्षेत्र तक ही दिखाई देती है। अतः यह कहा जा सकता है कि नगरीय उच्च जातियों के लिए जाति अपेक्षाकृत अदृश्य हो गई।
प्रश्न 5. भारत में जनजातियों का वर्गीकरण किस प्रकार किया गया है?
उत्तर- भारत में जनजातियों का वर्गीकरण उनके स्थायी तथा अर्जित लक्षणों के आधार पर किया गया है। इन आधारों का वर्गीकरण आगे किया गया है-
तालिका का विवरण
(1) स्थायी लक्षण
(क) भाषा के आधार पर- जनजातियों को चार श्रेणियों में बाँटा गया है। जनजातियों में लगभग 1% लोग इण्डो आर्यन (आर्य), 3% लोग द्रविड़, ऑस्ट्रिक परिवार की भाषा समस्त जनजाति तथा तिब्बती बर्मी परिवार की भाषाएँ 80% से अधिक जनजातीय द्वारा प्रयुक्त होती है।
(ख) क्षेत्र के आधार पर– जनजातियाँ अलग-अलग क्षेत्रों में फैली हुई हैं। 85% जनजातियाँ मध्य भारत में है, 11% जनसंख्या पूर्वोत्तर राज्यों में है। अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैण्ड जैसे राज्यों में इसकी जनसंख्या 60% से लेकर 95% तक है।
(ग) शारीरिक प्रजातीय आधार पर -शारीरिक प्रजातीय दृष्टि से जनजातीय लोगों को नीग्रिटो, आस्ट्रेलॉयड, द्रविड़ तथा आर्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
अर्जित लक्षण
(क) आजीविका के आधार पर आजीविका के आधार पर मछुआरे, खेतिहर, औद्योगिक कर्मचारी, कृषक आदि श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।
(ख) संस्कृतिकरण के आधार पर संस्कृति के द्वारा जनजातियों को हिन्दू समाज में आत्मसात् करने और शुद्ध वर्ण वालों को स्वीकार करने की सीमा है। इन लोगों को हिन्दू समाज में उनके व्यवहार तथा वित्तीय स्थिति देखकर शामिल किया गया।
प्रश्न 6. जनजातियाँ आदिम समुदाय हैं जो सभ्यता से अछूते रहकर अपना अलग-थलग जीवन व्यतीत करते हैं। इस दृष्टिकोण के विपक्ष में आप क्या साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहेंगे?
उत्तर- जनजातियाँ आदिम समुदाय हैं जो सभ्यता से अछूते रहकर अपना अलग-थलग जीवन व्यतीत करते हैं ऐसा मानने का कोई आधार नहीं है, जनजातियाँ विश्व के शेष हिस्सों से कटी रही हैं। वास्तविकता यह है कि भारत में सांस्कृतिक सम्पर्कों का शून्य बिन्दु (जीरो प्वॉइंट) है ही नहीं। सभी कबीले अपने से अधिक उन्नत संस्कृतियों के सम्पर्क में आए हैं। सम्पर्क स्थिति से समायोजन स्थापित कर अपेक्षाकृत सन्तोषप्रद जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
- अधिकांश भारतीय कबीलों का निवास वनों में है और वे वन्य प्राकृतिक साधनों पर ही निर्भर करते हैं।
- मध्यवर्ती तथा पश्चिमी भारत के तथाकथित राजपूत राज्यों में से अनेक रजवाड़े वास्तव में स्वयं आदिवासी समुदायों के स्तरीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से ही उत्पन्न हुए।
- आदिवासी लोग अक्सर अपनी आक्रामकता तथा स्थानीय लड़ाकू दलों से मिली भगत के कारण मैदानी इलाकों के लोगों पर अपना प्रभुत्व कायम करते हैं। जनजातियों को एक आदिम समुदाय के रूप में प्रमाणित करने वाले तथ्य सामान्य लोगों की तरह जनजातियों का कोई अपना राज्य अथवा राजनीतिक पद्धति नहीं है। सामान्य जातियों की तरह उनके समाज में भी कोई लिखित धार्मिक कानून नहीं है।
- प्रारम्भिक रूप से वे खाद्य संग्रहण, मछली पकड़ने, शिकार, कृषि इत्यादि गतिविधियों में संलिप्त रहे हैं।
प्रश्न 7. आज जनजातीय पहचानों के लिए जो दावा किया जा रहा है, उसके पीछे क्या कारण हैं?
उत्तर- जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने का आग्रह दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है, इसके निम्न कारण है-
(1) जनजातीय संस्कृति के बलात् समावेश का प्रभाव जनजाति के समाज पर ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
(2) मुख्यधारा की प्रक्रिया आमतौर पर जनजातीय समुदायों के लिए अनुकूल शर्तों पर नहीं होती इसलिए आज अनेक जनजातीय पहचानें गैर जनजातीय जगत की दुर्दमनीय शक्ति का प्रतिरोध करने के विचारों पर अपना ध्यान केन्द्रित करती हैं।
- झारखण्ड तथा छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के गठन के कारण जो सकारात्मक असर पड़ा, वह सतत् समस्याओं के कारण नष्ट हो गया। शनैः-शनैः उभरते हुए शिक्षित मध्यम वर्ग ने आरक्षण की नीतियों के साथ मिलकर एक नगरीकृत व्यावसायिक वर्ग का निर्माण किया है।
- जनजातीय समाज के भीतर भी एक मध्यवर्ग का प्रादुर्भाव हो चला है। इस वर्ग के प्रादुर्भाव से भूमि तथा संसाधनों पर नियन्त्रण, परियोजनाओं के लाभ में हिस्से की माँगें, अपनी पहचान को सुरक्षित रखने का आग्रह करती हैं। इसलिए अब जनजातियों में, उनके मध्य वर्गों में एक नई जागरूकता की लहर आ रही है तथा जिन्हें सरकार की आरक्षण नीतियों से बल मिला है।
प्रश्न 8. परिवार के विभिन्न रूप क्या हो सकते हैं?
उत्तर- परिवार एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था है। विभिन्न समाजों में विविध प्रकार के परिवार पाए जाते हैं; जैसे- आवास के नियम के अनुसार, पारिवारिक प्रथाओं के अनुसार, उत्तराधिकार के नियम के अनुसार आदि परिवार के गठन की यह संरचना आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षिक जैसे बहुत सारे कारकों पर निर्भर करती हैं। परन्तु अगर हम ध्यान से देखें तो आधुनिक समाज में मुख्य दो प्रकार के परिवार पाए जाते हैं, जो निम्नलिखित हैं-
(1) एकाकी परिवार-साधारणतया यह एक छोटी इकाई है जिसमें पति-पत्नी व उनके अविवाहित बच्चे रहते हैं। एकल परिवार के सदस्य अधिक आत्मनिर्भर होते हैं, स्वयं निर्णय लेने के लिए स्वयं उत्साहित होते हैं। जहाँ कोई समाज अधिक औद्योगिक व शहरी बन जाता है, वहाँ एकल परिवार होने की सम्भावना होती है।
(2) संयुक्त परिवार संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो सामान्यतया एक मकान में रहते हैं, एक ही रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य सम्पत्ति के भागी होते. है तथा जो किसी-न-किसी प्रकार से एक-दूसरे के रक्त सम्बन्धी होते हैं। संयुक्त परिवार में श्रम विभाजन करके सभी सदस्य एक-दूसरे के काम में हाथ बँटाते हैं तथा परिवार में सदस्यों के बीच सद्गुणों का विकास होता है।
प्रश्न 9. सामाजिक संरचना में होने वाले परिवर्तन पारिवारिक संरचना में किस प्रकार परिवर्तन ला सकते हैं?
उत्तर- परिवार हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। परिवार की संरचना को एक सामाजिक संस्था के रूप में देखा जाता है इसलिए इसका सम्बन्ध अन्य सामाजिक संस्थाओं से भी है। जिसे हम निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर समझ सकते हैं-
(1) परिवार की आन्तरिक संरचना का सम्बन्ध आमतौर पर समाज की अन्य संरचनाओं से होता है; जैसे-राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि अतः परिवार के सदस्यों के व्यवहारों में कोई भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन समाज के स्वभाव में परिवर्तन ला सकता है। उदाहरण के तौर पर, कार्य कर रहे युवा माता-पिता अपनी कार्य अवधि के दौरान अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए अपने घर दादा-दादी एवं नाना-नानी को बुला लेते हैं।
(2) परिवार का सम्बन्ध आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक स्तर से होता है।
(3) कभी-कभी परिवार में परिवर्तन तथा तत्सम्बन्धी समाज में परिवर्तन अप्रत्याशित रूप से भी अपघटित होता है; जैसे-युद्ध अथवा दंगों के कारण लोग सुरक्षा कारणों से काम की तलाश में प्रवासन करते हैं।
(4) कभी-कभी इस तरह के परिवर्तन किसी विशेष प्रयोजन से भी होते हैं; जैसे- स्वतन्त्रता तथा विचारों के खुलेपन के कारण लोग अपने रोजगार, जीवन-साथी तथा जीवन शैली का चुनाव करते हैं। इस तरह के परिवर्तन भारतीय समाज में बारंबार होते रहे हैं।
प्रश्न 10. मातृवंश (Matriliny) और मातृतन्त्र (Matriarchy) में क्या अन्तर है ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर- भारतीय समाज में कई प्रकार के परिवार पाए जाते हैं। आवास के नियम के अनुसार कुछ समाज विवाह और पारिवारिक प्रथाओं के मामले में पत्नी स्थानिक और कुछ पति-स्थानिक होते हैं। पत्नी स्थानिक परिवार में नवविवाहित जोड़ा वधू के माता-पिता के साथ रहता है और पति स्थानिक परिवार में नवविवाहित जोड़ा वर के माता-पिता के साथ रहता। है। उत्तराधिकार के नियम के अनुसार मातृवंश समाज में जायदाद माँ से बेटी को प्राप्त होती है। मातृतन्त्रात्मक परिवार संरचना में स्त्रियाँ समान प्रभुत्वकारी भूमिका निभाती हैं। मातृतन्त्र एक अनुभविक संकल्पना के स्थान पर एक सैद्धान्तिक कल्पना है। मातृतन्त्र का कोई ऐतिहासिक या मानवशास्त्रीय प्रमाण नहीं है अर्थात् ऐसा समाज नहीं है जहाँ स्त्रियाँ प्रभुत्वशाली हों हालांकि मातृवंशीय समाज अवश्य पाए जाते हैं जहाँ स्त्रियाँ अपनी माताओं से उत्तराधिकार के रूप में जायदाद प्राप्त करती हैं। मेघालय की खासी जयन्तिया तथा गारो जनजातियों तथा केरल के नयनार जाति के परिवार में सम्पत्ति का उत्तराधिकार माँ से बेटी को प्राप्त होता है।
परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.जाति की सदस्यता होती है?
(A) अस्थायी, (C) खुली,
(B) स्थायी, (D) बन्द ।
प्रश्न 2.अंग्रेजी शब्द ‘कास्ट’ (Caste) की उत्पत्ति हुई-
(A) ग्रीक मूल के शब्द से,\ ( B) पुर्तगाली मूल के शब्द से,
(C) फ्रेंच मूल के शब्द से, (D) यूरोपीय मूल के शब्द से ।
प्रश्न 3.”कास्ट इन इण्डिया” पुस्तक के लेखक का क्या नाम है ?
(A) जी. एस. घुरिये, (B) इमाइल दुर्खीम,
(C) जे. एच. हट्टन, (D) मैक्स बेवर।
प्रश्न 4.जाति का आधार है-
(A) धर्म, (C) जन्म,
(B) कर्म, (D) योग्यता ।
प्रश्न 5. जाति व्यवस्था को भारी धक्का लगा-
(A) मुस्लिमों के आने से, (B) सिक्खों के आने से,
(C) आर्यों के आने से, (D) उक्त सभी से।
प्रश्न 6.जाति व्यवस्था में हो रहे परिवर्तन के कारण हैं-
(A) धन का महत्त्व, (B) औद्योगिकीकरण,
(C) स्त्रियों की शिक्षा, (D) उक्त सभी ।
प्रश्न 7. जाति एक है-
(A) अन्तर्विवाही समूह, (C) परिवार का एक प्रकार,
(B) बहुविवाही समूह, (D) विवाह का एक प्रकार ।
प्रश्न 8.निम्नलिखित में से कौन-सा कारक जाति प्रथा में परिवर्तन के लिए उत्तरदायी नहीं है?
(A) स्वतन्त्रता आन्दोलन, (B) प्रजातन्त्र,
(C) मानव का चन्द्रमा पर पहुँचना, (D) स्त्री शिक्षा में वृद्धि।
प्रश्न 9‘अस्पृश्यता अपराध अधिनियम’ किस वर्ष में पारित किया गया?
(A) 1947, , (B) 1950.
(C) 1857, (D) 1955 |
प्रश्न 10. किसने कहा कि ‘जाति एक बन्द वर्ग’ है?
(A) डी. एन. मजूमदार (B) एस.सी. दुबे,
(C) टी.एन. मदान, (D) ए. आर. देसाई ।
प्रश्न 11.निम्नलिखित में ‘वर्ग’ है-
(A) ब्राह्मण, (B) क्षत्रिय,
(C) वैश्य, (D) युवा वर्ग।
प्रश्न 12.निम्नलिखित में से कौन वर्ग नहीं हैं?
(A) श्रमिक, (B) सामाजिक,
(C) पूँजीपति ( D) इनमें से कोई नहीं।
प्रश्न 13.परिवार एक संस्था है-
(A) आर्थिक, (B) हरिजन,
(C) राजनैतिक, (D) सांस्कृतिक ।
प्रश्न 14.संयुक्त परिवार में कितनी पीढ़ियाँ निवास करती हैं?
(A) एक, , (B) दो,
(C) तीन, (D) इनमें से कोई नहीं।
प्रश्न 15.निम्नलिखित में से कौन-सा परिवार का कार्य नहीं है?
(A) लैंगिक आवश्यकता की पुष्टि, (B) धार्मिक,
(C) सन्तानोत्पत्ति तथा पालन-पोषण, (D) घर की व्यवस्था ।
प्रश्न 16.पूँजीपति वर्ग को ‘शोषक वर्ग’ किसने कहा है?
(A) मार्क्स, (B) सोरोकिन,
(C) कॉम्ट, (D) दुर्खीम।
प्रश्न 17.भारत में ‘अनुसूचित जाति’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसके द्वारा किया गया ?
(A) महात्मा फुले, (C) डॉ. आम्बेदकर,
(B) साइमन कमीशन, (D) महात्मा गाँधी ।
प्रश्न 18भारत सरकार ने सबसे पहले एक अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की-
(A) सन् 1978 में, (B) सन् 1982 में,
(C) सन् 1987 में, (D) सन् 1986 में।
प्रश्न 19.अन्य पिछड़े वर्गों को किस प्रकार की श्रेणी में माना जाता है ?
(A) पिछड़ी श्रेणी, (B) अनुसूचित जाति,
(C) अस्पृश्य श्रेणी, (D) अवशिष्ट श्रेणी।
प्रश्न 20.उस व्यवस्था को क्या कहा जाता है जो एक सामाजिक प्राणी को अन्य व्यक्तियों के साथ जोड़ती है?
(A) नातेदारी, (C) जर्मीदारी,
(B) जजमानी, (D) महालवारी।
प्रश्न 21. उस नातेदार को किस श्रेणी में रखा जाता है जिसके साथ व्यक्ति के प्रत्यक्ष सम्बन्ध होते हैं?
(A) प्राथमिक, (C) तृतीयक,
(B) द्वितीयक, (D) इनमें से कोई नहीं।
प्रश्न 22.किस जनजाति में सह-प्रसविता या सहकष्टी की प्रथा पाई जाती है?
(A) गोंड, (C) भिलाला,
(B) कोरकू, (D) खासी।
| उत्तर- 1. (B), 2. (B), 3. (C), 4. (C), 5. (A), 6. (D), 7. (B), 8. (C), 9. (D), 10. (A), 11. (D), 12. (B), 13. (B), 14. (C), 15. (A), 16. (A), 17. (B), 18. (A), 19. (D), 20. (A) 21. (A), 22. (D). |
[D] रिक्त स्थान पूर्ति
- जाति एक सामाजिक संस्था है जिसका निर्धारण व्यक्ति के ————— से होता है।
- भारत में ‘जाति तथा वर्ग’ पुस्तक के लेखक का नाम ————-है ।
- ‘जाति’ शब्द की उत्पत्ति का पता 1665 में —————नामक विद्वान ने लगाया।
- शिक्षा के द्वारा—————– शक्तियों का सन्तुलित विकास होता है।
- नातेदारी व्यवस्था की अवधारणा को सर्वप्रथम ————-ने प्रस्तुत किया।
- संयुक्त परिवार की संरचना में सर्वोच्च स्थान——– का होता है।
- संयुक्त परिवार की प्रकृति ————–होती है।
- नातेदारी, विवाह और परिवार का समाजशास्त्र की शाखा है।
- वर्तमान समय में अनुसूचित जातियों की प्रमुख निर्योग्यताएँ सामाजिक एवं हैं।
- भारत में ————– राज्य की जनसंख्या में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या सर्वाधिक है।
- भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में —————धर्म को मानने वाले लोग बहुसंख्यक हैं।
- राष्ट्रीय महिला आयोग———————|
उत्तर- 1. धन्य, 2. जी. एस. घुरये, 3. ग्रेसिया डी ऑरटा, 4. बौद्धिक, 5. मरडॉक, 6. कर्ता का, 7. समाजवादी, 8. समाजशास्त्र, 9 आर्थिक, 10. मध्य प्रदेश, 11. ईसाई, 12. 1992 1
सत्य/असत्य
- जोतिराव गोविन्दराव फुले ने जाति व्यवस्था के अन्याय की भर्त्सना की।
- पारम्परिक तौर पर जातियाँ व्यवसाय से जुड़ी होती थीं।
- जाति की सदस्यता के साथ विवाह सम्बन्धी कठोर नियम शामिल नहीं होते हैं।
- उपनिवेशवाद की प्रमुख देन जाति व्यवस्था है।
- जनगणना के कार्य को सर्वप्रथम 1861 के दशक में प्रारम्भ किया गया।
- ई. वी. रामास्वामी नायकर के अनुसार हर व्यक्ति को स्वतन्त्रता और समानता का अधिकार है।
- ब्राह्मणों में 800 से अधिक उपजातियाँ हैं।
- भारत में अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम सन् 1958 में पास हुआ।
- भारत में सरकारी नीति के अनुसार जनता के उस समुदाय को अल्पसंख्यक माना जाता है, जिसकी जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है।
- वंचित समूह सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर होते हैं, इसलिए इन्हें दुर्बल वर्ग भी कहा जाता है।
- भारत के राजनैतिक और आर्थिक विकास में अल्पसंख्यकों की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है।
- भारत में कामकाजी महिलाओं के जीवन की मुख्य समस्या उनकी विभिन्न भूमिकाएँ हैं।
उत्तर- 1. सत्य, 2. सत्य, 3. असत्य, 4. सत्य, 5. असत्य, 6. सत्य, 7. सत्य, 8. असत्य, 9. सत्य, 10. सत्य, 11. असत्य, 12. सत्य ।
जोड़ी मिलाइए
I.
-
- सामाजिक संस्था (i) एक समझौता
- हिन्दू विवाह अधिनियम (ii) अनुसूचित जाति
- भारत में नातेदारी व्यवस्था (iii) 1956
- मुस्लिम विवाह (iv) इरावती कर्वे
- साइमन कमीशन (v) 1955
- हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम (vi) विवर
उत्तर- 1. (vi), 2. (v), 3. (iv), 4(1), 5. (ii) 6. (iii)
II.
-
- ज्योतिबा फुले (i) सामाजिक क्रान्ति
- सावित्री बाई फुले (ii) संस्कृतिकरण, प्रबल जाति
- श्री नारायण गुरु (iii) प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग
- मैसूर नरसिंहाचार श्रीनिवास (iv) दलित जातियाँ
- काका कालेलकर (v) प्रथम बालिका विद्यालय की प्रधान अध्यापिका
- वी. पी. मंडल (vi) मंडल आयोग
उत्तर- 1. (iv), 2. (v), 3. (i), 4. (ii) 5. (iii) 6. (vi) 1
III.
-
- आधुनिक समाज के लेखक (i) दो शेड्यूलड ट्राईब
- समाज पुस्तक के लेखक (ii) जे.एच. हट्टन
- भारत एक जाति (iii) मैक्स मूलर
- जाति व्यवस्था की उत्पत्ति की व्याख्या (iv) लुई ड्यूमाँ
- ‘भारत में जाति’ पुस्तक के लेखक (v) बीसेन्ज और बीसेन्ज
- जी. एस. घुरिये। (vi) मैकाइवर एवं पेज
उत्तर-1. (v), 2. (vi), 3. (iv), 4. (iii), 5. (ii), 6. → (1)
एक शब्द / वाक्य में उत्तर
- ‘जाति’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के किस शब्द से हुई है ?
- व्यक्ति की जाति का निर्धारण किससे होता है? ?
- जाति व्यवस्था का सबसे कठोर नियम कौन-सा है
- गोत्र का एक विस्तृत स्वरूप क्या है?
- दलितों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने और बच्चों को विद्यालय में दाखिला दिलाने की आजादी किसने दिलवायी ?
- जनजातियों के पृथक्करण का सुझाव किसने दिया है?
- सन् 1935 में सरकार ने किन जातियों को अनुसूचित जातियों का नाम दिया?
- किस विद्वान ने जनजातियों को पिछड़े हुए हिन्दू माना है?
- भारत सरकार द्वारा कितनी पूँजी से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास और वित्त स्थापना की गई है?
- नगालैण्ड, मेघालय और मणिपुर राज्य में किस धर्म के लोग अधिक है? निगम की
- सन् 1979 में नियुक्त दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग को किस नाम से जाना जाता है?
- राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना कब की गई ?
- किसी निम्न जाति द्वारा अपने से ऊँची जातियों की सांस्कृतिक विशेषता ग्रहण करना क्या कहलाता है ?
- भारत में कुल कितने आदिवासी समूह हैं?
- “वर्ग एक प्रतिष्ठित समूह है, जिसके पास शक्ति होती है” किसने कहा ?
- सन् 1873 से जनजातियाँ, जातियों में परिवर्तित हो रही है. किसने कहा था?
- जातियों के आपसी उप विभाजन को क्या कहते हैं?
- वंशानुक्रम की दृष्टि से परिवार कैसा होता है?
- मूल परिवार में कौन-कौन शामिल होता है?
| उत्तर – 1. जात, 2. जन्म से, 3. अन्तर्विवाह, 4. जनजाति, 5. अयन कल्ली, 6. प्रो. हट्टन ने, 7. दलित जातियों को, 8. डॉ. घुरिये ने, 9. ₹650 करोड़, 10. ईसाई धर्म, 11. मण्डल आयोग, 12. सन् 1992 में, 13. संस्कृतिकरण, 14, 461, 15. मैक्स वेबर, 16. सर हरबर्ट एच. रिजले, 17. खण्डात्मक संगठन 18. मातृवंशीय अशी 19. माता-पिता और उनके बच्चे। |
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. जाति क्या है?
उत्तर- जाति एक प्राचीन संस्था है जोकि हजारों वर्षों से भारतीय इतिहास एवं संस्कृति का एक हिस्सा है।
प्रश्न 2. जाति का क्या अर्थ है ?
उत्तर – जाति शब्द की उत्पत्ति पुर्तगाली मूल के शब्द कास्टा (Casta) से हुई है।पुर्तगाली कास्टा का अर्थ है- विशुद्ध नस्ल ।
प्रश्न 3. भारतीय समाज में जाति की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- (1) जाति जन्म से निर्धारित होती है।
(2) जाति समूह ‘सजातीय’ होते हैं अर्थात् विवाह समूह के सदस्यों में ही हो सकते हैं।
प्रश्न 4. भारतीय समाज कितने वर्गों में विभक्त था ?
उत्तर- भारतीय समाज चार वर्गों में विभक्त था-
(1) ब्राह्मण, (2) क्षत्रिय (3) वैश्य, (4) शूद
प्रश्न 5. जाति किस प्रकार संस्कृति का हस्तांतरण करती है?
उत्तर – एक जाति में जन्म लेने वाला व्यक्ति उस जाति विशेष के रहने सहने. खाने-पीने, काम कारने के ढंग को बचपन से सीखता है और बड़े होने पर वही ढंग अपनी अगली पीढ़ी को सिखाता है, जिससे संस्कृति का हस्तांतरण होता है।
प्रश्न 6. हरबर्ट रिजले की जनगणना का क्या महत्त्व है?
उत्तर – 1901 में हरबर्ट रिजले की जनगणना ने जाति के सामाजिक अधिक्रम के बारे में जानकारी इकट्ठी करने का प्रयत्न किया । जाति के सामाजिक बोध से गणना करना आसान हो गया।
प्रश्न 7. औपनिवेशिक शासन का जाति व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर- औपनिवेशिक शासन द्वारा किए गए हस्तक्षेपों से उच्च जातियों के रूढ़िगत अधिकारों को वैध मान्यता प्रदान की गई तथा सन् 1850 में ‘जाति अनर्हता उन्मूलन अधिनियम’ जाति प्रथा के प्रभावों को रोकने के लिए भी सरकार ने कदम उठाया।
प्रश्न 8. प्रजाति का क्या अर्थ है?
उत्तर- प्रजाति से तात्पर्य मनुष्यों के ऐसे आनुवंशिक शारीरिक लक्षणों से है जिनमें आधार पर हम विश्व के मनुष्यों को विभिन्न श्रेणियों में बाँटते हैं।
प्रश्न 9. अनुसूचित जनजाति का क्या अर्थ है?
उत्तर- अनुसूचित जनजाति भारत • आदिवासियों के लिए इस्तेमाल होने वाला एक वैधानिक पद है, जो अब भी राज्य के बाहर है।
प्रश्न 10. भारत में जनजाति की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- (1) जनजाति एक पृथक् समाज है। (2) जनजाति की एक विशिष्ट संस्कृति होती है।
प्रश्न 11. परिवार किसे कहते हैं?
उत्तर- परिवार एक आधारभूत समूह है। काम (sex) की स्वाभाविक प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए परिवार मनुष्यों के यौन सम्बन्धों एवं सन्तानोत्पत्ति की क्रियाओं का नियमन करता है।
प्रश्न 12. परिवार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर– परिवार मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं- (1) एकाकी परिवार, (2) संयुक्त परिवार।
प्रश्न 13. नातेदारी किसे कहते हैं?
उत्तर- सामाजिक मान्यताओं के अनुसार वे सभी सम्बन्ध जो विवाह और रक्त सम्बन्ध पर आधारित होते हैं इनमें निकट तथा दूर के, घनिष्ठ तथा कम, मधुर या कटु हर प्रकार के सम्बन्धियों का समावेश रहता है।
प्रश्न 14. परिवार के कार्य बताइए।
उत्तर- (1) यौन इच्छाओं की पूर्ति, (2) सन्तानोत्पत्ति, (3) प्रजाति की निरन्तरता ।
प्रश्न 15. नातेदारी की कितनी श्रेणियाँ होती हैं?
उत्तर– नातेदारी की तीन श्रेणियाँ होती हैं- (i) प्राथमिक नातेदार – पिता-पुत्र, भाई-बहन, माता-पुत्र, पति-पत्नी आदि ।
(ii) द्वितीयक नातेदार – चाचा, ताऊ, जीजा, साला।
(iii) तृतीयक नातेदार – ममेरे, फुफेरे, मौसेरे भाई-बहन आदि ।
प्रश्न 16. जनजाति की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- (1) जनजाति बहुत से परिवारों का समूह होता है जिसमें साझा उत्पादन होता है
(2) प्रत्येक जनजाति की साझी भाषा तथा अलग-अलग नाम होता है जिस कारण यह एक-दूसरे से अलग होते हैं।
प्रश्न 17. संयुक्त परिवार की परिभाषा दीजिए।
उत्तर– संयुक्त परिवार में परिवार की कई पीढ़ियों के सदस्य एक ही छत के नीचे
इकट्ठे रहते हैं तथा एक ही रसोई में बना भोजन खाते हैं। परिवार पर सबसे बड़े सदस्य का पूर्ण अधिकार होता है।
प्रश्न 18. पति तथा पत्नी स्थानिक का क्या अर्थ है?
उत्तर- पति स्थानिक-परिवार का वह रूप जिसमें विवाह के पश्चात् पत्नी, पति
अथवा उसके पिता के घर जाकर रहती हैं। पत्नी स्थानिक परिवार का वह रूप जिसमें विवाह के पश्चात् पति पत्नी के घर जाकर रहता है।
प्रश्न 19. केन्द्रीय परिवार का क्या अर्थ है?
उत्तर- केन्द्रीय परिवार वह परिवार है जिसमें पति-पत्नी व उनके अविवाहित बच्चे रहते हैं। विवाह के बाद अपना अलग घर बनाते हैं। वर्तमान समय में केन्द्रीय परिवार का अधिक चलन है।
प्रश्न 20. संयुक्त परिवार को बनाए रखने के दो कारक बताइए।
उत्तर- (1) कृषि – भारत कृषि प्रधान देश है जहाँ पर कृषि करने के लिए बहुत से व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। (2) धर्म- धर्म भारतीय संगठन का मूल आधार है। अनेक प्रकार के धार्मिक कार्य परिवार को एकजुटता में रहने की शिक्षा देता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. जाति का अर्थ एवं कार्य क्या है?
उत्तर– जाति, जन्म पर आधारित एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें खान-पान, विवाह करने, सामाजिक सम्बन्धों इत्यादि के सम्बन्ध में बहुत से नियम बनाए हुए होते हैं। व्यक्ति इसे आयुपर्यन्त परिवर्तित नहीं कर सकता है। जाति के कार्य जाति व्यक्ति के व्यवसाय का निर्धारण करती है। जाति व्यक्ति को सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता प्रदान करती है। जाति अपने तकनीकी रहस्यों को गुप्त रखती है।
प्रश्न 2. जाति सामाजिक एकता में बाधक है, कैसे?
उत्तर- जातिवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसमें एक जाति के लोग दूसरी की अपेक्षा अपने को श्रेष्ठ मानते हैं। एक जाति के लोग दूसरी जाति को बुरा-समझकर घृणा करते हैं। एक जाति दूसरी जाति को नीचा दिखाने की कोशिश करती है। यह भेदभाव समाज की एकता 1 को भंग करती है। कोई व्यक्ति योग्यता के आधार पर अपनी जाति परिवर्तित नहीं कर सकता। जाति व्यवस्था के यही प्रतिबन्ध सामाजिक ढाँचे का सन्तुलन बिगाड़ते हैं और यही समाज की उन्नति में बाधक हैं।
प्रश्न 3. जाति प्रथा के चार लाभों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- जाति प्रथा के लाभ निम्नलिखित हैं-
(1) सामाजिक स्थिरता प्रदान करना- प्रत्येक जाति के व्यवसाय, उसकी स्थिति निश्चित होती है, जिससे उनके सम्बन्ध स्थिर रहते हैं।
(2) हिन्दू समाज का बचाव- मध्य काल में मुगलों के हमले के समय हिन्दू समाज की रक्षा जाति व्यवस्था के प्रतिबन्ध से ही सम्भव हुई। अगर विवाह, खाने-पीने के प्रतिबन न होते तो हिन्दू समाज मुसलमानों में मिल जाता ।
(3) धार्मिक आधार प्रत्येक जाति के कर्तव्य धार्मिक भावना से जुड़े थे। प्रत्येक अपने धार्मिक संस्कारों की रक्षा की शिक्षा दी जाती थी।
(4) निश्चित व्यवसाय – जाति व्यवस्था में हर जाति के व्यवसाय निश्चित किए हैं। इससे प्रत्येक जाति के पास व्यवसाय थे।
प्रश्न 4. जाति प्रथा के चार दोषों को लिखिए।
उत्तर- (1) सामाजिक असमानता जाति व्यवस्था ने समाज में सामाजिक असमानता – की स्थिति पैदा कर दी है जिससे असमानता के कारण व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक शोषण का शिकार होता है।
(2) छुआछूत के लिए उत्तरदायी जाति व्यवस्था ने समाज में छुआछूत की भावना – पैदा की उच्च जातियाँ स्वयं को निम्न जातियों से श्रेष्ठ समझती हैं। निम्न जातियों को अनेक धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक निर्योग्यताओं का शिकार होना पड़ता है।
(3) प्रजातन्त्र में बाधक – प्रजातन्त्र स्वतन्त्रता, समानता और भाई-चारे की भावना पर आधारित है, जबकि जाति का आधार असमानता है।
(4) राष्ट्रीय एकता में बाधक – जाति व्यवस्था राष्ट्रीय एकता का सबसे महत्त्वपूर्ण बाधक तत्त्व माना जाता है।
प्रश्न 5. भारतीय जाति प्रथा की चार विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर- जाति प्रथा की संरचनात्मक और संस्थात्मक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) समाज का खण्डात्मक विभाजन- सम्पूर्ण समाज चार खण्डों में विभाजित कर दिया गया। यह खण्ड ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जाति के हैं।
(2) संस्तरण – एक सामान्य नियम के रूप में इस संस्तरण के अन्दर ब्राह्मण जाति का स्थान सर्वोच्च है, जबकि क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जातियों का स्थान क्रमशः दूसरा, तीसरा तथा चौधा है।
(3) खान-पान के प्रतिबन्ध – प्रत्येक व्यक्ति केवल अपनी जाति के व्यक्तियों द्वारा बनाए गए भोजन को ही ग्रहण करेगा।
(4) व्यावसायिक विभाजन – प्रत्येक जाति का व्यवसाय पूर्व-निर्धारित होता है। ब्राह्मण जाति का धार्मिक क्रियाएँ व शिक्षा देने का कार्य, क्षत्रिय का रक्षा और प्रशासन से सम्बन्धित, वैश्य का व्यापार तथा शूद का सेवाएँ और वे सब व्यवसाय जिन्हें अपवित्र माना गया में विभाजन किया गया।
प्रश्न 6. औद्योगिकीकरण का जाति प्रथा पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर- औद्योगिकीकरण से नगरों का विकास हुआ तथा विविध प्रकार के व्यवसाय तथा अनेक मिल, कारखाने आदि स्थापित हो गए। इन मिल-कारखानों तथा ऑफिसों में सभी जाति के लोगों को एक साथ काम करना होता है। इनमें जाति प्रथा के अनुसार न तो श्रम विभाजन या पेशों का विभाजन होता है और न ही ऐसा होना सम्भव है। इससे छुआछूत की भावना, पेशा सम्बन्धी प्रतिबन्ध दूर होते हैं। नगरों की जनसंख्या के बीच पड़ोसी, परिवार अथवा पंचायत का दबाव नहीं होता है जिससे जाति प्रथा शिथिल पड़ने लगती है।
प्रश्न 7. भारत में जनजातियों की मुख्य विशेषताएँ समझाइए ।
उत्तर– भारतीय जनजातियों की विशेषताएं निम्न हैं-
(1) सामान्य नाम-प्रत्येक जनजाति का अपना एक विशेष नाम होता है, जैसे-गॉड, मुण्डा, संथाल, भील आदि।
(2) एक क्षेत्रीय समुदाय- प्रत्येक जनजाति एक निश्चित भू-भाग; जैसे-जंगल, पहाड़ी, पठारी, सीमान्त प्रदेश आदि में निवास करता है।
(3) पृथक भाषा-एक जनजाति के सभी लोग अपनी भाषा या बोली में ही विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।
(4) आत्मनिर्भरता जनजाति एक आत्मनिर्भर समुदाय है। कुछ जनजातियाँ परम्परागत व्यवसाय और दस्तकारी की जगह खेती और श्रम के द्वारा भी अपनी जरूरतों को पूरा करते हैं।
(5) अन्तर्विवाही समुदाय एक जनजाति के सभी सदस्य अपनी जनजाति में ही विवाह सम्बन्ध स्थापित करते हैं। जनजाति से बाहर विवाह करने वाले को पंचायत द्वारा दण्डित किया जाता है।
प्रश्न 8. भारतीय जनजातियों की आर्थिक संरचना क्या है?
उत्तर- जनजातियों की आर्थिक संरचना सरल होती है। इनकी अपनी सामाजिक परम्पराओं के द्वारा ही इनकी आर्थिक संस्थाएँ चलती हैं। मुद्रा का अभाव होने के कारण वस्तुओं का विनिमय होता है। इनकी अर्थव्यवस्था में व्यापार लाभ के उद्देश्य से नहीं वरन् अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किया जाता है। इनके बाजार नियमित नहीं लगते, न ही बाजार में प्रतिस्पर्धा होती है, न ही एकाधिकार उत्पादन में विशेषीकरण का अभाव होता है। इनकी अर्थव्यवस्था जंगलों में लकड़ी काटने, शिकार करने, पशु चराने, वन्य वस्तुएँ एकत्र करने, वन्य शिल्प तथा कृषि करने तक ही सीमित हैं।
प्रश्न 9. अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- अनुसूचित जाति अनुसूचित जाति हिन्दुओं की सबसे अधिक शोषित और दलित जाति है, जिन्हें छुआछूत का सामना करना पड़ा था तथा आज भी सूक्ष्म तरीके से कुछ हद तक पीड़ित हैं। कभी-कभी यह स्पष्ट दिखता है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
अनुसूचित जनजाति – अनुसूचित जनजाति एक जनजातीय समूह है। इस समूह के लोग दूर-दराज क्षेत्रों में रहने वाले अलग-थलग रीति-रिवाजों को मानने वाले हैं। अनुसूचित जनजाति के लोग स्वायत्तता, संस्कृति, आरक्षण तथा नए राज्यों के निर्माण के लिए दबाव डालते रहे हैं।
प्रश्न 10. वर्तमान समय में जनजातीय पहचान के निर्माण को प्रभावित करने वाले कारकों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- वर्तमान समय में जनजातीय पहचान को सुरक्षित रखने का आग्रह दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। इसका मुख्य कारक जनजातीय समाज के भीतर एक मध्य वर्ग का प्रादुर्भाव है। विशेष रूप से इस वर्ग के प्रादुर्भाव के साथ ही, संस्कृति, परम्परा, आजीविका यहाँ कि भूमि तथा संसाधनों पर नियंत्रण और आधुनिकता की परियोजनाओं के लाभों में हिस्से को माँगें भी जनजातियों में अपनी पहचान को सुरक्षित रखने के आग्रह का अभिन्न अंग बन गई हैं। इसलिए अब जनजातियों में उनके मध्य वर्गों से एक नई जागरूकता की लहर आ रही है। ये मध्य वर्ग स्वयं भी आधुनिक शिक्षा और आधुनिक व्यवसायों का परिणाम है, जिन्हें सरकार की आरक्षण नीतियों से बल मिला है।
प्रश्न 11. ‘परिवार सामाजिक संरचना की धुरी है। ‘इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- हममें से हर कोई परिवार में उत्पन्न हुआ है और हममें से अधिकांश लोग परिवार में अनेक वर्ष बिताते हैं। आमतौर पर हम अपने परिवार से गहरा लगाव महसूस करते हैं। कभी कभी हम अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, सहोदर भाई-बहनों, चाचा-चाचियों, मामा-मामियों तथा चचेरे-ममेरे भाइयों-बहनों के बारे में लगाव महसूस करते हैं, जबकि दूसरों के बारे में हम ऐसा महसूस नहीं करते। एक ओर तो हम उनके हस्तक्षेप के लिए अप्रसन्नता या रोष प्रकट करते हैं, फिर जब भी हम उनसे दूर रहते हैं तो उनके रौबदारपूर्ण तरीकों के लिए तरसते हैं और याद करते हैं। परिवार गहरे स्नेह एवं देखभाल का स्थान है। दूसरी ओर, यह कटु संघर्षों, अन्याय और हिंसा का स्थान भी हो सकता है। परिवार और नातेदारी में मादा शिशु की हत्या, सम्पत्ति के लिए भाइयों के बीच हिंसापूर्ण लड़ाई-झगड़ें और घिनौने कानूनी विवाद भी इसका वैसे ही एक हिस्सा होते हैं, जैसे-प्यार, त्याग और बलिदान, पारस्परिक सुरक्षा एवं देखभाल की कहानियाँ हैं।
प्रश्न 12. परिवार के आर्थिक व सामाजिक कार्य बताइए।
उत्तर – आर्थिक कार्य-परिवार का सबसे बड़ा आधार आर्थिक है। कृषि प्रधान समाजों में तो परिवार ही उत्पादन की इकाई होती है। पारिवारिक व्यवस्था, जैसे- कृषि, दस्तकारी, गृह उद्योग, पशुपालन, शिकार आदि कार्यों में परिवार के सभी सदस्य समान रूप से योग देते हैं। परिवार में रहकर परिवार के सभी सदस्य अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं। सामाजिक कार्य – परिवार में बच्चों का पालन-पोषण किया जाता है। बच्चे परिवार के बीच में ही विकसित होते हैं। वे परिवार में ही भाषा, रीति-रिवाज, परम्परा तथा आचार को सीखते हैं। परिवार का महत्वपूर्ण योगदान इसके सदस्यों के समाजीकरण तथा उनके व्यवहारों के नियमन एवं सामाजिक नियन्त्रण में है।
प्रश्न 13. नातेदारी व्यवस्था क्या है?
उत्तर-मानव समाज में अकेला नहीं होता, जन्म से लेकर मृत्यु तक वह अनेक व्यक्तियों से घिरा होता है अर्थात् उसका सम्बन्ध एकाधिक व्यक्तियों से होता है। परन्तु इनमें से सबसे महत्वपूर्ण सम्बन्ध उन व्यक्तियों के साथ होता है जो विवाह बन्धन और रक्त सम्बन्ध के आधार पर सम्बन्धित हैं। इनमें भी निकट तथा दूर के, घनिष्ठ तथा अघनिष्ठ, मधुर और कठोर हर प्रकार के सम्बन्धियों का समावेश रहता है।
प्रश्न 14. नातेदारी के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर- नातेदारी मुख्यतः दो प्रकार की होती है-
(1) विवाह सम्बन्धी नातेदारी- जब एक व्यक्ति विवाह करता है तो विवाह से न केवल दो स्त्री-पुरुष के बीच सम्बन्ध स्थापित होता है बल्कि इन दोनों से सम्बन्धित अन्य अनेक व्यक्ति एक-दूसरे से सम्बद्ध हो जाते हैं; जैसे विवाह के पश्चात् एक पुरुष पति बनने के अलावा बहनोई, दामाद, जीजा, फूफा, मौसा, साढ़ आदि भी बन जाता है। इसी प्रकार एक स्त्री पत्नी बनने के साथ पुत्रवधु, भाभी, देवरानी जेठानी, चाची, मामी आदि भी बन जाती है। इसमें से प्रत्येक सम्बन्ध के आधार पर दो व्यक्ति होते हैं; जैसे- साला-बहनोई, सास-दामाद, साली जीजा, सास-बहू आदि ।
(2) रक्त सम्बन्धी – इसके अन्तर्गत वे लोग आते हैं जो समान रक्त के आधार पर एक-दूसरे से सम्बन्धित हों। उदाहरण के लिए, माता-पिता, और उनके बच्चों के बीच सम्बन्ध रक्त के आधार पर ही हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 1. जाति व्यवस्था का अर्थ एवं परिभाषा बताइए तथा जाति व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर- जाति शब्द संस्कृत के शब्द ‘जन’ से लिया गया है। जिसका अर्थ है-जन्म । जाति शब्द अंग्रेजी के शब्द ‘CASTE’ का हिन्दी रूपान्तर है, जो कि पुर्तगाली शब्द ‘Casta’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘नस्ल’। जाति की परिभाषाएँविभिन्न विद्वानों ने जाति व्यवस्था की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए जाति को अनेक परिभाषाओं द्वारा स्पष्ट किया है-
मजूमदार तथा मदान के अनुसार –
जाति एक बन्द वर्ग है।” इसका तात्पर्य है कि प्रत्येक जाति को एक ऐसे वर्ग के रूप में समझा जा सकता है जिसकी सदस्यता जन्म पर आधारित होती है तथा व्यक्ति को अपनी जाति को बदलने की किसी भी दशा में अनुमति नहीं दी जाती।
चार्ल्स कूले के अनुसार – “जब एक वर्ग पूरी तरह आनुवंशिकता पर होता है, तब हम उसे एक जाति कहते हैं। ”
जाति व्यवस्था की विशेषताएँ- जाति व्यवस्था की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) समाज का खण्डनात्मक विभाजन- जाति एक ऐसी व्यवस्था है जिसके द्वारा सम्पूर्ण समाज को चार खण्डों (Segments) में विभाजित कर दिया गया। यह खण्ड ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जाति के हैं। एक-एक खण्ड के अन्दर बहुत-सी जातियों का समावेश होता है। प्रत्येक खण्ड के सदस्यों की सामाजिक स्थिति कर्तव्य और व्यवहार के नियम पूर्व-निर्धारित होते हैं।
(2) संस्तरण- जाति व्यवस्था के अन्तर्गत विभिन्न जातियों के बीच ऊँच-नीच का एक स्पष्ट संस्तरण होता है। एक सामान्य नियम के रूप में इस संस्तरण के अन्दर ब्राह्मण जातियों का सर्वोच्च स्थान है, जबकि क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जातियों का स्थान क्रमशः दूसरा, तीसरा तथा चौथा है।
(3) खान-पान के प्रतिबन्ध – इस प्रतिबन्ध का सम्बन्ध भी पवित्रता और अपवित्रता की धारणा से है। जाति व्यवस्था में सामान्य नियम यह रखा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल अपनी जाति के व्यक्तियों द्वारा बनाये गये भोजन को ही ग्रहण करेगा। इसके बाद ही खान-पान के प्रतिबन्ध को कच्चे और पक्के भोजन के रूप में दो भागों में विभाजित करके स्पष्ट किया। गया। विशेष परिस्थिति में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य जातियों को एक-दूसरे के द्वारा बनाये गये। पक्के भोजन को ग्रहण करने की अनुमति दी गयी लेकिन इनमें से किसी भी जाति को अपने निम्न जाति द्वारा बनाये गये कच्चे भोजन को ग्रहण करने पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है।
(4) सामाजिक और धार्मिक निर्योग्यताएँ- जाति व्यवस्था ने कुछ जातियों को सामाजिक व धार्मिक क्षेत्र में विशेष अधिकार प्रदान किये हैं और कुछ जातियों को अनेक अधिकारों से बिल्कुल वंचित कर दिया है। इस सम्बन्ध में सबसे अधिक निर्योग्यताएँ अछूत जातियों के लिए हैं जैसे उनको सार्वजनिक सड़कों पर चलने, दिन में निकलने और मन्दिरों के पास जाने का अधिकार नहीं दिया जाता था। स्कूलों में शिक्षा पाने, कुओं और तालाबों का प्रयोग करने और सार्वजनिक स्थानों पर बैठने के सम्बन्ध में भी उन कठोर नियन्त्रण था।
(5) व्यावसायिक विभाजन– जाति व्यवस्था में प्रत्येक जाति के द्वारा किये जाने वाले व्यवसाय का रूप पूर्व-निर्धारित होता है। साधारणतया ब्राह्मण जातियों के लिए धार्मिक क्रियाओं तथा शिक्षा देने का कार्य, क्षत्रिय जातियों के लिए रक्षा और प्रशासन से सम्बन्धित व्यवसाय, वैश्य जातियों के लिए व्यापार और पशुपालन का व्यवसाय तथा शूद्रों के लिए सेवा एवं ऐसे व्यवसाय निर्धारित किये गये जिन्हें गंदा और अपवित्र समझा जाता है। सभी जातियों को यह विश्वास दिलाया गया कि अपनी जाति के लिए निर्धारित व्यवसाय करना ही उनका धार्मिक कर्तव्य है।
(6) अन्तर्विवाह – जाति व्यवस्था का सबसे कठोर नियम यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ही जाति के अन्दर विवाह करना आवश्यक है। इसी को अर्न्तविवाह का नियम कहा जाता है। व्यावहारिक रूप से अन्तर्विवाह ही जाति व्यवस्था का सार तत्व है। इस नियम के कारण ही भारत में जातियों का विभाजन इतने लम्बे समय तक स्थायी और प्रभावपूर्ण बना रह सका।
(7) आदर प्रतिमान– जाति व्यवस्था में सभी जातियों को अपने से ऊँची जातियों के प्रति आदर और सम्मान देने के लिए निश्चित नियम बनाये गये मनु द्वारा निर्धारित नियमों के द्वारा विभिन्न जातियों के लिए टैक्स वसूली, अपराध करने पर दण्ड, ब्याज की दर, सम्पत्ति अधिकार और व्यवहार के तरीकों के क्षेत्र में अलग-अलग व्यवस्थाएँ की गई। इनका उद्देश्य विभिन्न जातियों के बीच उच्चता और निम्नता के सम्बन्धों की स्थायी बनाना था।
(8) जातियों की आत्मनिर्भरता – विभिन्न जातियों को कार्यात्मक आधार पर एक-दूसरे से जोड़े रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई जिससे सभी जातियाँ एक-दूसरे पर निर्भर रहें। इस व्यवस्था को जजमानी व्यवस्था के रूप में आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सरलता से देखा जा सकता है।
प्रश्न 2, जाति व्यवस्था के गुण/कार्यो/ भूमिका की वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारतीय जाति प्रथा अपनी ही तरह की विचित्र और सेवक संख्या है। गर्म सीमा के बाहर हिन्दुओं का जो अपनापन है, उसकी अनोखी अभिव्यक्ति यह जाति प्रथा है। आज भारत में लगभग 3,000 जातियाँ और उपजातियाँ है। जाति प्रथा अन्य के आधार पर सामाजिक संस्तरण और खण्ड विभाजन की यह गतिशील है जोखी विवाह, पैशे आदि के सम्बंध में अनेक या कुछ प्रतिबन्धों को अपने सदस्यों पर लागू करती है। जाति प्रथा का प्रभाव जीवन के समस्त सम्बन्धों और घटनाओं पर आधारित होता है। जाति प्रथा के गुण जाति के गुण/लाभ/कार्यों को तीन भागों में जाता है-
(1) सदस्यों के व्यक्तिगत जीवन में लाभ के गुण-व्यक्ति के जीवन के समस्त सम्बन्धों पर जाति का प्रभाव पड़ता है। अपने सदस्यों के व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्धित जाति के कार्य निम्नलिखित हैं-
(i) सामाजिक स्थिति को निश्चित करना-जाति जन्म से ही अपने सदस्य की सामाजिक स्थिति को निश्चित करती है, जिसे सम्पति, दरिद्रता, सफलता और किसी भी प्रकार से हटाया नहीं जा सकता।
(ii) मानसिक सुरक्षा प्रदान करना-जाति प्रत्येक व्यक्ति का पद और उसके कार्य को जन्म से ही निश्चित करके सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है।
(iii) पेशे का निर्णय-प्रत्येक जाति का पेशा जन्म से ही निश्चित हो जाता है और बचपन से ही उस पेशे के पर्यावरण में पलने के कारण उसके विषय में व्यक्ति की स्वतः ही सामान्य ज्ञान प्राप्त हो जाता है।
(iv) जीवनसाथी का चुनाव-जाति का विवाह सम्बन्धी कार्य भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जाति इस बात का निर्णय करती है कि व्यक्ति को किस समूह में विवाह करना है।
(v) व्यवहारों पर नियन्त्रण- प्रत्येक जाति के अपने नियम और प्रतिबन्ध होते हैं। इन नियमों और प्रतिबन्धों के द्वारा जाति अपने सदस्यों के व्यवहारों पर नियन्त्रण रखती है।
(2) जाति समुदाय से सम्बन्धित गुण-जाति न केवल व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्धित कार्यों को करती है बल्कि अनेक कार्य भी करती है।
(i) धार्मिक भावनाओं की रक्षा प्रत्येक जाति की अपनी धार्मिक विधियाँ होती हैं, जिनकी वह रक्षा करते हैं तथा अलग-अलग जातियों के अलग-अलग देवी-देवता भी होते हैं।
(ii) रक्त की शुद्धता बनाये रखना-जाति, विवाह सम्बन्धी विविध निषेधों द्वारा जाति के रक्त की शुद्धता बनाए रखने में सहायक होती है। विशेषकर नीचे की जातियों के साथ सम्मिश्रण से बचने के लिए जाति प्रथा एक उत्तम व्यवस्था है।
(iii) संस्कृति की सुरक्षा प्रत्येक जाति की अपनी एक निजी शिक्षा-पद्धति, ज्ञान कुशलता आदि होती है, जाति अपनी संस्कृति को स्थिर बनाये रखती है।
(iv) सामाजिक स्थिति प्रदान करना प्रत्येक जाति अपने समुदाय के लिए एक निश्चित सामाजिक स्थिति को निर्धारित करती है। सामुदायिक प्रयत्न और आन्दोलन के द्वारा अपने सदस्यों की स्थिति को उन्नत करने में भी सहायक होती है।।
(3) सामाजिक कार्य जाति – व्यक्ति के लिए या अपने जातीय समुदाय के लिए कार्य नहीं करती बल्कि सम्पूर्ण समाज के लिए भी अनेक कार्यों को करती है।
(i) समाज के विकास और संरक्षा में सहायता देना- जाति प्रथा ने समाज को ऐसी अवस्था प्रदान की है जिसमें कोई भी समुदाय अपनी विशिष्ट प्रकृति और अपनी पृथक सत्ता को बनाए रखते हुए अपने को समग्र समाज में एक सहयोगी अंग के रूप में उपयुक्त बना सकता है।
(ii) राजनीतिक स्थिरता को बनाए रखना भारत पर विभिन्न समयों में विदेशि ने आक्रमण किए। मुसलमान और अंग्रेज आधुनिक समय में इसके उत्तम उदाहरण है। लेकिन जाति प्रथा ने भारतीय समाज और सामाजिक संगठन को ही नहीं अपितु अपनी संस्कृति को भी नष्ट होने से बचाया।
(iii) समाज को सरल श्रम विभाजन-जाति-प्रथा के कारण ही समाज के सब कार्य शिक्षा से लेकर सफाई तक गृहस्थी से लेकर सरकारी कार्य तक सुचारु रूप से चलते हैं और ये सभी कार्य धार्मिक विश्वास या ‘कर्म’ की धारणा के आधार पर किए जाते हैं।
(iv) समाजवादी ढाँचे का आधार-जाति प्रथा को प्राचीनकाल का सुपरीक्षित वैज्ञानिक समाजवाद मानते हैं। जाति प्रथा प्रत्येक व्यक्ति को समाज में उसका स्थान, कार्य, पेशा तथा मित्र मण्डली प्रदान करती है।
(v) शिक्षा दान जाति व्यक्ति की शिक्षा के प्रति मनोवृत्ति को निश्चित करती है और उसे किस प्रकार की शिक्षा मिलेगी, यह भी स्थिर करती है; जैसे- ब्राह्मण की शिक्षा, क्षत्रिय की शिक्षा आदि।
प्रश्न 3. जाति प्रथा समाज का आधार होते हुए भी इससे होने वाली हानियाँ समाज को विघटित करती हैं। समझाइए ।
उत्तर – जाति प्रथा समाज का आधार है, उनके लाभों के होते हुए भी जाति प्रथा दोषों से मुक्त नहीं है। डॉ राधाकृष्णन ने लिखा है, “दुर्भाग्यवश वही जाति प्रथा जिसे सामाजिक संगठन को नष्ट होने से रक्षा करने के साधन के रूप में विकसित किया गया था, आज उसी की उन्नति में बाधक बन रही है।” उपर्युक्त कथन जाति प्रथा के दोषों को दृष्टिगोचर करती है, जो निम्नानुसार है-
(1) आर्थिक दृष्टिकोण- आर्थिक दृष्टिकोण से जाति प्रथा के अवगुण या दोष निम्नवत् हैं-
(i) श्रमिक की गतिशीलता में बाधा- जातीय प्रतिबन्ध एक व्यक्ति को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र नहीं करता वह स्वतन्त्रतापूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर पेशे को चुन नहीं पाता है। इससे श्रमिक की स्वतन्त्र गतिशीलता रुक जाती है।
(ii) श्रमिक की कुशलता में बाधक व्यक्ति को अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार व्यवसाय का चुनाव करने का अवसर नहीं मिल पाता, उसे जातिगत व्यवसाय का ही मन मारकर चयन करना होता है। जिसका प्रभाव श्रमिक की कुशलता पर पड़ता है।
(iii) गुटों का निर्माण – उद्योगों में जातियों के आधार पर श्रमिकों के बँट जाने से संघर्षपूर्ण गुटों का निर्माण होता है जिसका उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
(iv) अनुत्पादक वर्ग जाति व्यवस्था ने कर्मकाण्डों और धार्मिक कुरीतियों को प्रोत्साहन देकर समाज में एक बड़े अनुत्पादक वर्ग का निर्माण किया है।
(2) राजनीतिक दृष्टिकोण – राजनीतिक दृष्टिकोण से जाति प्रथा के दोष निम्नवत्
1- (i) राष्ट्रीय एकता में बाधक भारतीय समाज ऊँच-नीच की भावना पर आधारित
सैकड़ों-हजारों जातियों में विभाजित है। सभी जातियाँ राष्ट्रीय हित की तुलना में अपनी ही जाति के हित को अधिक महत्व देती है। (ii) लोकतन्त्र के विरुद्ध जाति व्यवस्था के नियम पूरी तरह प्रजातन्त्र के विरोधी है। लोकतन्त्र के लिए समानता, स्वतन्त्रता और सामाजिक न्याय आवश्यक है। इसके विपरीत जाति व्यवस्था के नियम सामाजिक असमानता, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगाते हैं।
(iii) अनावश्यक दलों का प्रादुर्भाव-जाति व्यवस्था विभाजन का कारण है। जातियों के आधार पर अनेक राजनीतिक दल बन रहे हैं तथा जाति सम्बन्धी समीकरणों के आधार पर ही चुनाव लड़े जाते हैं।
(3) सामजिक दृष्टिकोण सामाजिक दृष्टिकोण से जाति प्रथा के दोष निम्नवत है-
(i) छुआछूत की समस्या जाति व्यवस्था का सबसे गम्भीर परिणाम छुआछूत की समस्या है। मानव, मानव को ऊँचा और नीचा, छूत-अछूत समझकर घृणा की दृष्टि से अपमानित कर रहा है।
(ii) सामाजिक शोषण निम्न जातियों का सामाजिक शोषण तथा उन्हें आर्थिक अधिकारों से वंचित करना, इसी व्यवस्था का परिणाम है।
(iii) सामाजिक कुरीतियों का जन्म धार्मिक कर्मकाण्ड, ऋण लेकर भी ब्राह्मण भोज जैसी कुरीतियों के पालन से निर्धन और अधिक निर्धन हो जाता है।
(iv) स्त्रियों का शोषण जाति व्यवस्था में स्त्रियों को किसी तरह के अधिकार न मिलने के कारण स्त्रियों के शोषण ने एक गम्भीर समस्या का रूप ले लिया है। बाल-विवाह, दहेज-प्रथा, बेमेल विवाह और विधवा विवाह आदि समस्याएँ पैदा होने लगीं। (v) यह व्यवस्था सामाजिक समानता, सामाजिक न्याय और स्वतन्त्रता के सिद्धान्तों के विरुद्ध है।
प्रश्न 4. भारतीय जाति व्यवस्था में वर्तमान में क्या परिवर्तन हुए हैं ? स्पष्ट कीजिए।
अथवा
जाति व्यवस्था में आधुनिक परिवर्तनों की विवेचना कीजिए।
उत्तर- भारतीय जाति प्रथा में अनेक क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं और भविष्य में होने की आशा की जाती है। इन कारकों में लोकतान्त्रिक व्यवस्था, धर्मनिरपेक्ष राजनीति, नगरीकरण, शिक्षा में वृद्धि, समाज सुधार आन्दोलन आदि प्रमुख है।
समकालीन भारत में जाति व्यवस्था में होने वाले परिवर्तन निम्नवत है-
(1) जातीय संस्तरण में परिवर्तन-जातियों का विभाजन अभी भी है परन्तु आज किसी भी जाति को दूसरी जाति की तुलना में अधिक श्रेष्ठ नहीं माना जाता सामाजिक व्यवस्था में एक अकुशल ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय की तुलना में निम्न जाति के कुशल और योग्य व्यक्ति को अधिक ऊँचा स्थान मिलने लगा है।
(2) जाति सम्बन्धी नियमों में बदलाव- परम्परागत जातिगत नियम समाप्त हो चु हैं, आज अन्तर्जातीय विवाहों का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। खान-पान और पवित्रता तथ अपवित्रता से सम्बन्धित नियम पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं। आज सभी व्यवसाय सभी जातिय द्वारा किए जा रहे हैं।
(3) जाति की सदस्यता में परिवर्तन-वर्तमान में कहीं भी व्यक्ति जातियों की उत्पत्ति को ईश्वर द्वारा रचित नहीं मानता। जन्म के आधार पर किसी भी जाति को दूसरी से ऊँचा व नीचा नहीं माना जाता। व्यक्ति की सामाजिक स्थिति उसकी योग्यता पर निर्भर है।
(4) जाति संगठनों के रूप में परिवर्तन-प्राचीन समय में जाति व्यवस्था में जाति पंचायतों का बहुत बड़ा योगदान था। आज यह पंचायत प्रभाव समाप्त हो गया है। जाति संगठन का आधार आज राजनीतिक है सामाजिक या धार्मिक नहीं। प्रत्येक संगठन राजनीतिक दलों से अपने लिये अधिक सुविधाओं की माँग करता है।
(5) शक्ति के मानदण्डों में अन्तर – आज नगरों तथा गाँवों में प्रत्येक समूह की शक्ति का मुख्य आधार उसकी संख्या, शिक्षा, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव है। भारत में उन् राजनीतिक दलों का शासन है जो दुर्बल और दलित जातियों का समर्थन कर रहे हैं।
(6) ब्राह्मण जातियों के प्रभुत्व में कमी- आज सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में ब्राह्मणों का प्रभुत्व तेजी से कम हो रहा है। स्वयं ब्राह्मण जातियों के भी अधिकांश लोग अब सामान्य सेवा, खेती, व्यापार तथा औद्योगिक श्रम के द्वारा आजीविका उपार्जित करने लगे हैं।
(7) जजमानी सम्बन्धों में परिवर्तन – सेवाएँ देने और सेवाएँ लेने वाली जातियों क विभाजन अब पूरी तरह टूट चुका है। नगरों में जजमानी व्यवस्था की जगह बाजार व्यवस्था ने ले ली है। स्पष्ट है कि वर्तमान भारतीय समाज में जाति की संरचना में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं
प्रश्न 5. उन तत्वों का उल्लेख कीजिए जिनसे जाति व्यवस्था में परिवर्तन हो रहे हैं ?
अथवा
जाति प्रथा में परिवर्तन लाने वाले कारकों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर – जाति प्रथा में परिवर्तन लाने वाले प्रमुख कारक एवं तत्व निम्नलिखित हैं-
(1) पश्चिमी संस्कृति – पश्चिमी संस्कृति के सम्पर्क में आने के कारण भारत में लोग रूढ़िवाढ़िता को छोड़कर धीरे-धीरे पश्चिमी संस्कृति का अनुकरण कर रहे हैं। इच्छानुसार व्यवसाय का चयन कर रहे हैं। पश्चिमी संस्कृति ने जाति के सदस्यों में स्वतन्त्र भावनाओं क विकास किया है।
(2) औद्योगीकरण – भारत में औद्योगीकरण के कारण विभिन्न उद्योगों, फैक्ट्रियों क स्थापना हुई। इन फैक्ट्रियों में सभी जातियों के लोग एक साथ मिलकर कार्य करते हैं, जिससे जाति प्रथा के बन्धन कमजोर होते जाते हैं।
(3) लोकतन्त्र की स्थापना- स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद लोकतन्त्र में सभी जातियों के सदस्यों को समान अधिकार दिए गए हैं। अधिकारों की समानता जाति प्रथा को समाप्त करने की क्षमता रखती है।
(4) नगरीकरण – औद्योगिकी के विकास से नगरों का विकास तेजी से होने लगा। ग्रामीण जनता नगर में निवास करने लगी और जाति के बन्धन को समाप्त कर सभी साथ-साथ रहने लगे।
(5) सामाजिक अधिनियम- स्वतन्त्रता के बाद संविधान में अस्पृश्यता अपराध निरोधक अधिनियम तैयार किए गए जिसमें अनुसूचित जातियों व जनजातियों के विकास सम्बन्धी कई प्रावधान बनाये गये।
(6) स्त्री शिक्षा का प्रसार – भारत में औद्योगिकीकरण के विकास के कारण स्त्रियों की । शिक्षा का विकास हुआ। स्त्रियों को समाज में सम्मान भी दृष्टि से देखा जाने लगा
(7) संयुक्त परिवार का विघटन – औद्योगिकीकरण के विकास के कारण संयुक्त परिवार विघटित होकर एकल परिवार में परिवर्तित होने लगे।
प्रश्न 6. भारत में ग्रामीण और नगरीय वर्ग संरचना का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारतीय समाज मुख्यतः ग्रामीण और नगरीय दो क्षेत्रों में बँटा हुआ है। ग्रामीण वर्गों की संरचना और नगरीय वर्ग संरचना अलग-अलग है जोकि निम्नलिखित है-
भारतीय ग्रामीण वर्ग संरचना
(1) मालिक तथा साहूकार वर्ग- ग्रामीण क्षेत्र में सर्वोच्य वर्ग के अन्तर्गत जमींदार एवं साहूकार आते हैं, ये गाँव के प्रधान कहलाते हैं। इनकी आर्थिक स्थिति उच्च होती है तथा समस्त ऐश्वर्य इनके जीवन में होते हैं। ये लोग आर्थिक सम्पन्न होने के साथ-साथ राजनीतिक व सामाजिक दृष्टि से भी धनी होते हैं।
(2) कृषक वर्ग- ग्रामीण क्षेत्र में दूसरा वर्ग किसानों का होता है जिनके पास अपनी भूमि होती है, जिस पर वह खेती करते हैं। इनका जीवन स्तर साहूकार व जमींदार से नीचा होता है। (3) भूमिहीन किसान एवं मजदूर वर्ग-भूमिहीन किसान दूसरों के खेतों पर मजदूरी करके जीवन निर्वाह करते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में यह वर्ग संख्या में अधिक होता है। भूमिहीन किसान साल भर मजदूरी करके बहुत मुश्किल से दो जून की रोटी जुटा पाता है।
भारतीय नगरीय वर्ग संरचना
(1) उच्च वर्ग- शहर में इस वर्ग के लोग बड़ी-बड़ी फर्मों के मालिक व कारखानों के मालिक होते हैं। इनका प्रभाव राजनीतिक दलों पर भी रहता है। ये समस्त सुख-सुविधा सम्पन्न वर्ग है।
(2) मध्यम वर्ग – इस वर्ग के लोगों का उत्पादन के साधनों पर नियन्त्रण नहीं होता। ये लोग परम्परा व रूढ़ियों से बँधे होते हैं तथा सामाजिक, धार्मिक, नैतिक नियमों का पालन करते हैं।
(3) निम्न वर्ग / मजदूर वर्ग- इस वर्ग के अन्तर्गत खानों, मशीनों, फैक्टरियों आदि पर काम करने वाले मजदूर आते हैं। इने पास सीमित साधन होते हैं। अपनी आवश्यकताओं को कठिनाई से पूरा कर पाते हैं।
प्रश्न 7 जनजाति का क्या अर्थ है? विभिन्न परिभाषाओं के माध्यम से समझाइए।
उत्तर- जनजाति का अर्थ-जनजाति का अर्थ एक ऐसे जन-समुदाय से है जो साथ मिलकर आजीविका की खोज में इधर-उधर घूमता है। इस प्रकार के जन-समुदाय के इस वन्य- जाति, आदिवासी या जनजाति आदि नामों से पुकारते हैं। एक जनजाति एक आधुनिक शब्द है जो ऐसे समुदायों के लिए प्रयुक्त होता है जो बहुत पुचते हैं और उप-महाद्वीप के सबसे पुराने निवासी हैं। ‘जनजाति’ शब्द का प्रयोग औपनिवेशिक युग में प्रारम्भ हुआ।
जनजाति की परिभाषाएँ-
(1) गिलिन तथा गिलिन के अनुसार- जनजाति स्थानीय कुलों तथा वंशों की एक व्यवस्था है जो एक समान भू-भाग पर रहते हैं, समान भाषा बोलते हैं तथा एक जैसी ही संस्कृति का अनुसरण करते हैं।
(2) इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया के अनुसार– जनजाति परिवारों का एक ऐसा समूह होता है जिसका एक नाम होता है। इसके सदस्य एक ही भाषा बोलते हैं तथा एक हो भू-भाग में रहते हैं तथा अधिकार रखते हैं अथवा अधिकार रखने का दावा करते हैं तथा जो अन्तर्ववाहित हो चाहे अब न हो।” इस तरह हम कह सकते हैं कि जनजाति छोटे समाज के रूप में एक निश्चित भू-भाग पर रहते हैं। जिनकी अपनी साामजिक संरचना, भाषा एवं संस्कृति है। प्रत्येक जनजाति की अलग भाषा, परम्पराएँ, खाने-पीने इत्यादि के ढंग होते हैं। वर्तमान में इन जनजातियों को भारत सरकार तथा संविधान ने सुरक्षा तथा विकास के लिए बहुत-सी सुविधाएँ, जैसे आरक्षण इत्यादि दिए हैं तथा धीरे-धीरे यह लोग मुख्य धारा में आ रहे हैं।
प्रश्न 8. भारत में पाई जाने वाली जनजातियों के वर्गीकरण की विवेचना कीजिए।
उत्तर – जनजाति का तात्पर्य एक ऐसे समुदाय से हैं जिसने बहुत प्राचीनकाल से अपनी एक अलग संस्कृति की पहचान बनाई है। जनजाति शब्द का प्रयोग औपनिवेशिक युग में प्रारम्भ किया गया था। समुदाय के एक अत्यन्त विषम समुदाय के लिए एक अकेले शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से ही किया गया था।
भारत में पाई जाने वाली जनजातियों का वर्गीकरण
(1) सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर – जनजातीय कल्याण समिति ने भारत की समस्त जनजातियों को सांस्कृतिक क्षेत्रों के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया है-
(A) जनजातीय समुदाय – ये वे समुदाय हैं जो अपने मूल स्थान पर ही निवास करते हैं तथा परम्परागत नियमों का पालन कर अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाते हैं।
(B) अर्द्ध-जनजातीय समुदाय – इस वर्ग में वे जनजातियाँ सम्मिलित हैं जो अपना निवास स्थल छोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने लगी हैं तथा जीविकोपार्जन के लिए कृषि पर निर्भर हैं।
(C) परसंस्कृतिकृत जनजातीय समुदाय-इस वर्ग में वे जनजातियाँ आती हैं जो नगर, कस्बों में जाकर रहने लगी हैं तथा औद्योगीकरण का लाभ लेकर विभिन्न उद्योगों में कार्य करती हैं। उद्योगों में कार्य करते समय विभिन्न अन्य समुदाय के सम्पर्क में आकर शेष समाज को संस्कृति को अपना रही है।
(2) भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर जनजातियों को इस प्रकार वर्गीकृत कर सकते हैं-
(A) हिमालय का क्षेत्र इस क्षेत्र में रहने वाली जनजातियाँ पहाड़ियों तथा वन में निवास करती हैं। मुख्यतः थारू और भेटिया, गुज्जर, भोट, किन्नरा (उत्तर प्रदेश और हिमालय (प्रदेश में), कुकी, गारो, खासी (असम और मेघालय), नागा समूह (नगालैंड), रियाना (त्रिपुरा), मिजो (मिजोरम), डाफला अरुणाचल प्रदेश में हैं।
(B) मध्य भारत – भारत की जनजातीय जनसंख्या व्यापक रूप से बिखरी हुई है लेकिन कुछ क्षेत्रों में उनकी आबादी काफी घनी है। जनजातीय जनसंख्या का लगभग 85% भाग ‘मध्य भारत’ में रहता है। इस क्षेत्र की प्रमुख जनजातियाँ हैं- संथाल, मुण्डा, उराँव, गोंड, सावर, जुआँग, कुमार बैगा, कोरकू, हलवा (मध्य प्रदेश)।
(C) दक्षिणी भारत- इस क्षेत्र की प्रमुख जनजातियों में तमिलनाडु की इरूला, माला, कुशवान टोड़ा, आन्ध्र प्रदेश की कोया, अनादी, कर्नाटक की भारती और परावा, केरल की पुलावर, अंडमान निकोबार द्वीप की अंडमान निकोबारी आदि प्रमुख है।
(3) जनसंख्या के आकार की दृष्टि से जनसंख्या के आधार पर जनजातियों में बहुत अन्तर पाया जाता है। सबसे बड़ी जनजाति की जनसंख्या लगभग 70 लाख है जबकि सबसे छोटी जनजाति अण्डमान द्वीप समूह में है जिनकी जनसंख्या 100 से भी कम है। सबसे बड़ी जनजाति गोंड, भील, संथाल, मीणा, बोडो और मुंडा है। जनजातियों की कुल जनसंख्या 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की समस्त जनसंख्या का लगभग 8-2% या लगभग 84 करोड़ व्यक्ति है।
(4) जीविका व अर्जित विशेषक की दृष्टि से अर्जित विशेषकों पर आधारित वर्गीकरण दो मुख्य कसौटियों आजीविका के साधन और हिन्दू समाज में उनके समावेश की सीमा दोनों के सम्मिश्रण पर आधारित है। आजीविका के आधार पर, जनजातियों को मछुआ, आखेटक, झूम खेती करने वाले, कृषक और बागान के कामगार आदि हैं।
प्रश्न 9. भारत में जनजातियों की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- भारत में जनजातियों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) एक सामान्य नाम- प्रत्येक जनजाति का अपना एक विशेष नाम होता है तथा इसी के आधार पर एक जनजाति के सभी लोग समानता में बँधे रहते हैं। गोंड, मुण्डा, संथाल, भील तथा टोडा आदि भारत की कुछ बड़ी जनजातियाँ हैं।
(2) एक क्षेत्रीय समुदाय– प्रत्येक जनजाति एक निश्चित भू-भाग में निवास करती है। इनका निवास क्षेत्र जंगल, पहाड़ी, पठारी प्रदेश होता है। →
(3) पृथक भाषा -प्रत्येक जनजाति की एक अलग भाषा होती है। सभी लोग अपनी भाषा या बोली में विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।
(4) आत्मनिर्भरता जनजाति – एक आत्मनिर्भर समुदाय है। ये अपने क्षेत्र में मिलने बाली वस्तुओं से ही अपना जीवन-यापन करती थीं। जनजातियाँ दूसरे समुदाय की तुलना में आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से अन्य समुदाय पर बहुत कम निर्भर हैं।
(5) राजनीतिक संगठन- प्रत्येक जनजाति के अपने-अपने अलग सामाजिक कानून है। इन कानूनों को संगठन अथवा जनजाति के मुखिया द्वारा लागू किया जाता है।
(6) अन्तर्विवाही समुदाय – एक जनजाति के सभी सदस्य अपनी जनजाति में ही विवाह सम्बन्ध स्थापित करते हैं। जनजाति व कबीले के बाहर विवाह करने पर मुखिया द्वारा दण्डित किया जाता है।
(7) प्रथागत कानून-जनजातियों के व्यवहारों पर नियन्त्रण रखने में प्रथाओं की भूमिका सबसे अधिक होती है। प्रथा तोड़ने वाले व्यक्ति को उनके समुदाय में एक गम्भीर अपराध माना जाता है।
(8) सामाजिक संस्तरण का अभाव- जनजाति को एक समरूप समुदाय कहा जाता है। जनजातियों में सामाजिक, आर्थिक अथवा सांस्कृतिक रूप से किसी को ऊँचा या नीचा नहीं समझा जाता।
प्रश्न 10. जनजाति का सामान्य परिचय देते हुए भारतीय जनजातियों की संवैधानिक स्थिति को उजागर कीजिए।
उत्तर- जनजाति (Tribe)- वह सामाजिक समुदाय है जो राज्य के विकास के पूर्व अस्तित्व में था या जो अब भी राज्य के बाहर हैं। जनजाति वास्तव में भारत के आदिवासियों के लिए प्रयोग होने वाला एक वैधानिक पद है। भारत में संविधान में अनुसूचित जनजाति पद का प्रयोग हुआ है। भारत में जनजातियों की जनसंख्या-1991 की जनगणना के अनुसार भारत में जनजातियों की जनसंख्या 6,77,58,380 है। है।
संवैधानिक स्थिति – भारत में अनुसूचित जनजातियों से सम्बन्धित कई प्रावधान मुख्यतः इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है-
(1) सुरक्षा तथा विकास,
(2) अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा सम्बन्धी प्रावधान।
संविधान के अनुच्छेद – 15(4), 16(4), 19 (5), 23, 29, 46, 164, 330, 334, 335, 338, 339 (1) 371 (क) (ख) व (ग) पाँचवी सूची व छठी सूची में निहित हैं। अनुसूचित जनजातियों के विकास से सम्बन्धित प्रावधान मुख्य रूप से अनुच्छेद 275 (1) प्रथम उपबन्ध तथा 339(2) में निहित हैं। इस समय भारत में अनुसूचित जनजातियों की संख्या 700 से ऊपर है। किसी भी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल करने के आधार – (1) आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक पृथक्करण, समाज के एक बड़े भाग में सम्पर्क में संकोच, पिछड़ापन आदि हैं।
प्रश्न 11. अनुसूचित जनजाति की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं? प्रकाश डालिए।
उत्तर- अनुसूचित जनजाति वर्तमान समाज में अपने अस्तित्व के लिए अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। भारत सरकार ने जनजातियों के उत्थान के लिए कई कदम उठाए हैं एवं
इनके उत्थान के लिए वर्तमान में भी प्रयासरत हैं। लेकिन इसके बाद भी भारतीय जनजातियाँ आर्थिक एवं सामाजिक रूप से काफी अविकसित है।
अनुसूचित जनजाति की प्रमुख समस्याएँ-
(1) भूमि से अलग होना – जनजातियों की मुख्य समस्या भूमि से अलग होना है। जनजातियाँ आज भी सभ्य समाज से दूर जंगलों और पर्वतों में अधिक निवास करती हैं। जनजातियों की प्रमुख समस्या भूमि से अलग हो जाने की रही है। प्रशासनिक अधिकारी, वन विभाग के ठेकेदार, इत्यादि के प्रवेश से उनका शोषण प्रारम्भ हुआ है।
(2) अशिक्षा – जनजाति की दूसरी समस्या अशिक्षा है, जनजाति के लोग शिक्षा में काफी पिछड़े हुए हैं। यह लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजने की बजाए खेतों में काम करवाना अधिक पसंद करते हैं।
(3) बंधक मजदूर – ऋणग्रस्तता, अज्ञानता आदि कारणों से यह लोग बंधक मजदूर बन जाते हैं। इनमें केवल एक व्यक्ति ही नहीं होता बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंधक के रूप में कार्य करते हैं।
(4) बेरोजगारी – जनजातियों की आजीविका के परम्परागत स्रोत सीमित है। जिससे इनमें बेरोजगारी की समस्या बनी रहती है। यह लोग शिक्षित बहुत ही कम होते हैं, इसलिए इन लोगों को कोई अच्छा काम भी नहीं मिल पाता है।
(5) निर्धनता –जनजातीय समुदाय में निर्धनता की स्थिति उनके अस्तित्व के लिए संकट पैदा करती है। इनकी आजीविका का मुख्य साधन कंद-मूल, शिकार, जलाने की लकड़ियाँ तथा छोटी-मोटी झोंपड़ियों तक ही सीमित है। आर्थिक रूप से यह लोग काफी पिछड़े हुए हैं।
(6) ऋणग्रस्तता – जनजाति की ऋणग्रस्तता की समस्या काफी गम्भीर समस्या रही है। जनजातियाँ अपनी उपभोग की सीमित आवश्यकताओं के साथ प्रकृति पर ही निर्भर रहते हुए सरल जीवन जीते थे, लेकिन बाहरी समाज या सभ्य समाज के सम्पर्क में आने से इनकी सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थिति में बदलाव होने लगे हैं। इन लोगों की जीवन भर की कमाई खाने-पीने में ही निकल जाती है और ये जनजातियाँ ऋणी हो जाती है।
(7) नशे की लत – जनजातियों में शराब, बीड़ी, तम्बाकू आदि का चलन बहुतायत में पाया जाता है। इनका नशा करना इनकी आदत बन चुकी है। इन लोगों में परम्परागत रूप से देशी शराब को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परम्परा है। आदिवासियों में पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएँ भी शराब का सेवन करती हैं।
(8) प्राकृतिक आपदाएँ=- प्राकृतिक आपदाएँ भी जनजातियों की समस्याएँ रही है। प्राकृतिक आपदाओं के कारण स्थायी या अस्थायी रूप से इन्हें अपने मूल स्थान से दूर जाने के लिए विवश कर देती हैं।
प्रश्न 12. परिवार का क्या अर्थ है? इसकी प्रमुख परिभाषाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- किसी भी समाज की संरचना को समझने के लिए परिवार एक बुनियादी इकाई यौन-सम्बन्धों के रूप में देखा जाता है। परिवार शब्द अंग्रेजी के शब्द Family का रूपान्तर है। परिवार कुछ लोगों का इकट्ठा होना नहीं, बल्कि उनमें सम्बन्धों की व्यवस्था है। यह एक ऐसी संस्था है, जिसमें स्त्री और पुरुष ‘काम’ की स्वाभाविक प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए यौन सम्बन्ध एवं सन्तानोत्पत्ति की क्रियाओं का नियमन करता है।
परिवार की प्रमुख परिभाषाए-
(1) मैकाइवर एवं पेज – के अनुसार परिवार एक ऐसा समूह है जिसमें यौन सम्बन्ध पाए जाते हैं तथा इसमें सन्तान का प्रजनन एवं पालन-पोषण होता है।
(2) ऑगबर्न एंव निमकॉफ के अनुसार- परिवार स्थायी समिति है जिसका निर्माण पति-पत्नी से मिलकर हुआ है चाहे उनकी सन्तान हो या न हो।
(3) किंग्सले डेविस के अनुसार – परिवार ऐसे व्यक्तियों का समूह है जिनमें सहगोता तथा रक्त सम्बन्ध जैसी समानता मिलती है। इकाई है।
(4) इलियट एवं मैरिल के अनुसार- परिवार पति-पत्नी तथा बच्चों की एक जैविक
(5) कूले के अनुसार– कुले ने परिवार को मानव स्वभाव का सम्बर्धन ग्रह कहा है। संक्षेप में परिवार को जैविकीय सम्बन्धों पर आधारित एक सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित कर सकते हैं जिसमें माता-पिता और बच्चे होते हैं तथा जिसका उद्देश्य अपने सदस्यों के लिए सामान्य निवास, आर्थिक सहयोग, यौन सन्तुष्टि, प्रजनन, समाजीकरण और शिक्षण आदि की सुविधाएँ जुटाना है। भारतीय समाज की आधारशिला परिवार है। यह एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समूह है, सर्वव्यापी संस्था है। परिवार जिसमें माता-पिता व बच्चे होते हैं। परिवार का निर्माण विवाह संस्था के द्वारा होता है। एक परिवार में रक्त सम्बन्धों का पाया जाना अति आवश्यक है। इसके अभाव में परिवार का गठन होना भी सम्भव नहीं है। परिवार का गठन मूलतः तीन सम्बन्धों पर निर्भर है-
(1) पति-पत्नी के सम्बन्ध,
(2) माता-पिता एवं बच्चों के सम्बन्ध,
(3) भाई-बहनों के सम्बन्ध इन तीन सम्बन्धों में प्रथम प्रकार का सम्बन्ध वैवाहिक सम्बन्ध है, जबकि दूसरे और तीसरे प्रकार का सम्बन्ध रक्त सम्बन्ध होता है।
परिवार के प्रकार
(1) संख्या के आधार पर परिवार को उनकी सदस्य संख्या के आधार पर तीन प्रकारों में बाँटा जा सकता है-
(i) केन्द्रीय या नाभिक परिवार इसमें एक पुरुष, एक स्त्री और उनके आश्रित बच्चे रहते हैं।
(ii) संयुक्त परिवार में तीन या तीन से अधिक पीढ़ियों के सदस्य एक साथ एक ही घर में निवास करते हैं।
(iii) विस्तृत परिवार जिसमें परिवार के सभी रक्त सम्बन्धी और कुछ अन्य सम्बन्धी भी सम्मिलित रहते हैं। इसमें मातृ और पितृ पक्ष दोनों के सदस्य रहते हैं।
(2) निवास के आधार पर निवास के आधार पर परिवार को चार प्रकारों में बाँटा गया है-
(i) पितृस्थानिक परिवार जिसमें विवाह के बाद पत्नी अपने पति के माता-पिता के – साथ रहती है।
(ii) मातृस्थानिक परिवार जिसमें विवाह के बाद पति अपनी पत्नी के साथ एवं पत्नी के माता-पिता के साथ रहता है।
(iii) नवस्थानीय परिवार इस परिवार में पति-पत्नी एक अलग जगह पर घर बनाकर रहते हैं।
(iv) द्विस्थानीय परिवार इसमें विवाह के बाद पति-पत्नी अपने जन्म के परिवारों में रहते हैं। पति रात्रि में अपनी पत्नी के घर जाता है लेकिन दिन में यह अपने जन्म के परिवार में रहता है।
(3) अधिकार के आधार पर अधिकार के आधार पर परिवार में माता-पिता में से जिसकी सत्ता चलती है, परिवार को दो प्रकारों-पितृ और मातृसत्तात्मक में बाँटा गया है।
(i) पितृसत्तात्मक वह परिवार है, जिसमें सत्ता और अधिकार पिता और पुरुषों के हाथ में रहता है एवं
(ii) मातृसत्तात्मक वह परिवार है जिसमें स्त्री के पास अधिकार, सत्ता और नियन्त्रण रहता है।
(4) वंश के आधार पर– इसमें परिवार को मातृवंशीय और पितृवंशीय में बाँटा गया है। इसमें जब परिवारों में वंश परम्परा माँ के नाम से चलती है तो मातृवंशीय परिवार कहलाता है। जब परिवारों में वंश परम्परा पिता के नाम से चलती है और पुत्रों को पिता का ही वंशनाम प्राप्त होता है।
(5) विवाह के आधार पर -विवाह के आधार पर भी परिवार को एक विवाही और बहुविवाही परिवार में बाँटा गया है। एकविवाही परिवार जिसमें एक पुरुष व एक स्त्री के सम्मिलन से बनता है और बहुविवाही परिवार में एक समय में एक से अधिक जीवन साथी स्वीकृत होते हैं।
प्रश्न 14. परिवार की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- परिवार को विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(1) सार्वभौमिकता – परिवार समाज की मौलिक एवं छोटी इकाई है। समाज के सभी स्तरों में पायी जाती है।
(2) भावात्मक आधार- परिवार के सभी सदस्य भावात्मक रूप से एक-दूसरे से बँधे रहते हैं। इन सदस्यों में आपसी सहयोग, त्याग व वात्सल्य पाया जाता है।
(3) रचनात्मक प्रभाव परिवार के सदस्यों का परिवार के छोटे बच्चों में सांस्कृतिक गुणों का हस्तान्तरण होता है जिससे वह संस्कारवान बनते हैं।
(4) छोटा आकार–परिवार समाज की लघु इकाई होता है। इसमें रक्त सम्बन्ध के आधार पर पति-पत्नी और उनके बच्चे होते हैं।
(5) असीमित उत्तरदायित्व –व्यक्ति परिवार में जन्म लेता है, बड़ा होता है एवं मृत्यु को प्राप्त करता है। इसलिए परिवार के सदस्यों के असीमित उत्तरदायित्व होते हैं, जो व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करता है।
(2) निवास के आधार पर – निवास के आधार पर परिवार को चार प्रकारों में बाँटा गया है-
(i) पितृस्थानिक परिवार जिसमें विवाह के बाद पत्नी अपने पति के माता-पिता के – साथ रहती है।
(ii) मातृस्थानिक परिवार जिसमें विवाह के बाद पति अपनी पत्नी के साथ एवं पत्नी के माता-पिता के साथ रहता है।
(iii) नवस्थानीय परिवार इस परिवार में पति-पत्नी एक अलग जगह पर घर बनाकर रहते हैं।
(iv) द्विस्थानीय परिवार इसमें विवाह के बाद पति-पत्नी अपने जन्म के परिवारों में रहते हैं। पति रात्रि में अपनी पत्नी के घर जाता है लेकिन दिन में यह अपने जन्म के परिवार में रहता है।
(3) अधिकार के आधार पर अधिकार के आधार पर परिवार में माता-पिता में से जिसकी सत्ता चलती है, परिवार को दो प्रकारों-पितृ और मातृसत्तात्मक में बाँटा गया है।
(i) पितृसत्तात्मक वह परिवार है, जिसमें सत्ता और अधिकार पिता और पुरुषों के हाथ में रहता है एवं
(ii) मातृसत्तात्मक वह परिवार है जिसमें स्त्री के पास अधिकार, सत्ता और नियन्त्रण रहता है।
(4) वंश के आधार पर इसमें परिवार को मातृवंशीय और पितृवंशीय में बाँटा गया है। इसमें जब परिवारों में वंश परम्परा माँ के नाम से चलती है तो मातृवंशीय परिवार कहलाता है। जब परिवारों में वंश परम्परा पिता के नाम से चलती है और पुत्रों को पिता का ही वंशनाम प्राप्त होता है।
(5) विवाह के आधार पर विवाह के आधार पर भी परिवार को एक विवाही और बहुविवाही परिवार में बाँटा गया है। एकविवाही परिवार जिसमें एक पुरुष व एक स्त्री है।


