bharat-amerika sambandhon ki shuruaat 1947 mein bharat ki swatantrata ke saath hui. in sambandhon ko sheet yudh ke dauran kai chunautiyon ka samna karna pada, kyonki america pakistan ka samarthan kar raha tha aur 1974 mein bharat dwara kiye gaye parmanu parikshan ke baad usne bharat par parmanu pratibandh laga diye the. vietnam yudh aur soviet sangh ke saath bharat ke badhte sambandhon ke karan, jiske parinamswaroop donon deshon ne apna gathbandhan samapt kar diya, sanyukt rajya america ne 1962 ke chin-bharat yudh ke dauran bharat ko seemit sainya sahayata pradan ki.
भारत-अमेरिका संबंधों की शुरुआत 1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ हुई। इन संबंधों को शीत युद्ध के दौरान कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि अमेरिका पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था और 1974 में भारत द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण के बाद उसने भारत पर परमाणु प्रतिबंध लगा दिए थे। वियतनाम युद्ध और सोवियत संघ के साथ भारत के बढ़ते संबंधों के कारण, जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशों ने अपना गठबंधन समाप्त कर दिया, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1962 के चीन-भारत युद्ध के दौरान भारत को सीमित सैन्य सहायता प्रदान की।
⇐भारत-अमेरिका संबंध: ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान स्थिति⇒

प्रश्न 1. अमेरिकी वर्चस्व के किन्हीं चार रूपों को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर- अमेरिकी वर्चस्व के चार रूपों को संक्षेप में निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) अमेरिकी वर्चस्व का आधार स्तम्भ उसकी सैन्य शक्ति है। वर्तमान अमेरिकी सैन्य शक्ति स्वयं में सम्पूर्ण तथा विश्व के समस्त देशों में बेजोड़ है।
(2) विश्व अर्थव्यवस्था में एकमात्र अपनी इच्छा चलाने वाला देश अमेरिका है जो इस व्यवस्था को लागू करने तथा उसे लगातार बनाए रखने की प्रचुर आर्थिक क्षमता रखता है। मुद्रा
(3) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं में अमेरिका का ही वर्चस्व है। विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय कोष तथा विश्व व्यापार संगठन इत्यादि संस्थाओं में उसी के द्वारा ही बनाए गए नियम कानून लागू किए जाते हैं।
(4) अमेरिकन भाषा-शैली एवं साहित्य, विविध कलाओं, जीवन प्रणाली तथा फिल्मों इत्यादि को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका उसे किसी-न-किसी रूप में प्रोत्साहन देता है। उसके पास अन्य देशों को इस तथ्य से सहमत करने की अपार शक्ति भी है।
प्रश्न 1. वैश्विक घटनाचक्र की किन घटनाओं से अमेरिकी वर्चस्व का पता चलता
उत्तर- वैश्विक स्तर पर घटित निम्न घटनाओं से अमेरिकी वर्चस्व की जानकारी मिलती है-
(1) प्रथम खाड़ी युद्ध ⇒
अमेरिकी वर्चस्व के प्रथम उदाहरण के रूप में पहला खाड़ी बुद्ध विशेष रूप से उल्लेखनीय है जब अमेरिका ने अपने सैन्य बलों की शक्ति पर कुवैत को इराक से आजाद कराया है। इस हमले ने वैश्विक स्तर पर अमेरिकी सैन्य शक्ति को अत्यधिक बढ़ाया जिसके परिणामस्वरूप विश्व एक ध्रुवीय व्यवस्था की ओर तेजी से अग्रसर हुआ।
(2) सूडान एवं अफगानिस्तान पर हमला⇒
1998 में नैरोबी (केन्या) तथा द्वारे (तंजानिया) में स्थित अमेरिकी दूतावासों पर बम विस्फोट हुए जिसके लिए से प्रभावित आतंकी संगठन अलकायदा को उत्तरदायी माना गया। इस आतंकी हमले है फलस्वरूप तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने ‘ऑपरेशन इनफाइनाइट रीचा आदेश दिया। इस ऑपरेशन के अन्तर्गत सूडान एवं अफगानिस्तान में आतंकी अलकायदा ठिकानों पर अनेक बार क्रूज मिसाइलों से अमेरिकी हमले किए गए। इस कार्यवाही के लिए अमेरिका ने न तो अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का ध्यान रखा तथा न ही संयुक्त राष्ट्रसंघ से अनुमति ही ली। इस घटनाचक्र से सुस्पष्ट है कि अमेरिका को विश्व में किसी की भी वह नहीं है जो उसके वर्चस्व को प्रमाणित करता है।
(3) आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान-
11 सितम्बर, 2001 को देशों के 19 आतंकवादियों द्वारा अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित वल्ड ट्रेड सेण्टर तथा स्थित रक्षा मुख्यालय पेंटागन पर हमला किया जिसमें लगभग तीन हजार लोगों की जाने चली गई। अमेरिका सहित विश्व समुदाय को हिलाकर रख देने वाली इस घटना के प्रतिक्रियास्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान के अन्तर्गत ‘ऑपरेशन एण्ड्यूरिंग फ्रीडम’ चलाया। इस ऑपरेशन का प्रमुख लक्ष्य अलकायदा तथा अफगानिस्तान का तालिबानी शासन था। इस दौरान अमेरिका ने सम्पूर्ण विश्व में गिरफ्तारियाँ की तथा गिरफ्तार (बन्दी) बनाए गए लोगों के सम्बन्ध में उनकी सरकारों तक को सूचना नहीं दी थी। विभिन्न देशों से बन्दी बनाए गए लोगों को अलग-अलग देशों के कारागारों में गोपनीय तरीके से रखा गया। इन बन्दियों से संयुक्त राष्ट्र संघ तक के अधिकारियों को मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई। उक्त घटना से अमेरिकी वर्चस्व का पता चलता है कि वह विश्व की एक बड़ी सैन्य शक्ति है जो संयुक्त राष्ट्र संघ तक की परवाह नहीं करता है।
(4) द्वितीय खाड़ी युद्ध–
19 मार्च, 2003 को अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति न मिलने के बावजूद तथा सम्पूर्ण विश्व की अनदेखी करते हुए ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ के अन्तर्गत इराक पर सैन्य हमला किया। विश्व को इस हमले का कारण बताते हुए अमेरिका ने कहा कि इराक को सामूहिक संहार के हथियार बनाने से रोकने हेतु उसके द्वारा यह आक्रमण किया गया। हालांकि इस आक्रमण के पीछे अमेरिका का लक्ष्य इराक के तेल भण्डारों पर कब्जा करना तथा वहाँ अपनी पसन्द की सरकार बनवाना था।
प्रश्न 2. विश्व राजनीतियों में अमेरिकी वर्चस्व पर किस प्रकार नियन्त्रण लगाया, जा सकता है?
उत्तर – अमेरिकी वर्चस्व पर नियन्त्रण (अंकुश)
विश्व राजनीति में संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्चस्व पर निम्न प्रकार नियन्त्रण अथवा अंकुश लगाया जा सकता है-
(1) वर्चस्व तन्त्र में रहते हुए अवसरों का लाभ उठाया जाए- आर्थिक वृद्धि दर को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए व्यापार को प्रोत्साहन, प्रौद्योगिकी का हस्तान्तरण तथा निवेश परमावश्यक है। इस दृष्टिकोण से अमेरिका के साथ विरोध न करके उसके साथ मिलकर कार्य करने में सरलता रहेगी। सर्वाधिक शक्तिशाली देश के विरुद्ध जाने की अपेक्षा उसके वर्चस्व तन्त्र में रहते हुए अवसरों को प्रत्येक सम्भव लाभ उठाना ही उचित एवं सार्थक रणनीति है।
(2) वर्चस्व वाले देश से उचित दूरी बनाए रखने का प्रयास करना – जहाँ तक हो सके वर्चस्व वाले देश से दूर-दूर रहना चाहिए। उदाहरणार्थ चीन, रूस तथा यूरोपीय संघ इत्यादि किसी-न-किसी तरह से स्वयं अपने आप को अमेरिकी नजरों में आने से बचाते रहे हैं। क्योंकि ये देश स्वयं अपने आप को अमेरिकी क्रोध की चपेट में आने से रोकना चाहते हैं। हालांकि छोटे देशों के लिए यह नीति आकर्षक रणनीति सिद्ध हो सकती है लेकिन अकल्पनीय है कि भारत, रूस तथा चीन इत्यादि देश अथवा यूरोपीय संघ जैसा विश्व संगठन स्वयं को लम्बी समयावधि तक अमेरिकी दृष्टि से बचाए रख सके।
(3) अमेरिकी वर्चस्व से निपटने हेतु राज्येतर संस्थाएँ आगे आएँगी अमेरिकी – वर्चस्व का प्रतिकार कोई भी देश अथवा अन्तर्राष्ट्रीय संगठन कर ही नहीं सकता क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में विश्व के लगभग सभी राष्ट्र अमेरिकी शक्ति के सामने बौने एवं लाचार हैं। अमेरिकी वर्चस्व से निपटने हेतु राज्येतर संस्थाएँ ही आगे आ सकती है। आर्थिक तथा सांस्कृतिक धरातल पर ही अमेरिका के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की जा सकती है। लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी तथा मीडिया इत्यादि का एक वर्ग ही संयुक्त राज्य अमेरिका के समक्ष एक दीवार खड़ी कर सकता है। उक्त राज्येतर संस्थाएँ एक विश्वव्यापी नेटवर्क स्थापित करने में सक्षम है जिसमें अमेरिकी जनसाधारण भी अपनी सहभागिता कर सकता है। इस प्रकार संयुक्त रूप से गलत अमेरिकी नीतियों की आलोचना तथा प्रतिरोध किया जा सकेगा।
प्रश्न 3. भारत-अमेरिका के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
Discuss India-US relations.
उत्तर- भारत-अमेरिका सम्बन्ध
भारत तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में कभी निकटता, तो कभी दूरियाँ पनपनी रही हैं। मार्च 2000 से दोनों देशों के सम्बन्धों में मधुरता का दौर शुरू हुआ 22 वर्षों की लम्बी समयावधि के पश्चात् तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन की 21 मार्च, 2000 की पाँच दिवसीय भारत यात्रा भारत-अमेरिकी सम्बन्धों में एक नया मोड़ ले आयी है। सितम्बर 2000, नवम्बर 2001 तथा जुलाई 2005 में भारतीय प्रधानमन्त्री की अमेरिकी यात्राओं से दोनों देशों के सम्बन्धों में निकटता तथा मधुरता आई है। जहाँ जून 2005 में दोनों ही देशों के बीच दस वर्षीय रक्षा समझौता हस्ताक्षरित हुआ, वहीं इसी ऐतिहासिक वर्ष में अमेरिका के मध्य कृषि सहयोग समझौता करके सम्बन्धों को एक नवीन दिशा प्रदान की गई। 2 मार्च, 2006 को अमेरिकी राष्ट्रपति बुश की भारत यात्रा के दौरान ऐतिहासिक असैन्य परमाणु ऊर्जा सहयोग समझौता दोनों देशों के सम्बन्धों में एक मील का पत्थर सिद्ध होगा। 2 अक्टूबर, 2014 को श्री नरेन्द्र मोदी जी की अमेरिकी यात्रा के दौरान नाभिकीय समझौता हुआ। 66वें भारतीय गणतन्त्र दिवस 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मुख्य अतिथि थे। 2016 में भारतीय प्रधानमन्त्री मोदी ने अमेरिकी कांग्रेस को सम्बोधित किया। 25-26 जून, 2017 को भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिका यात्रा से दोनों देशों के सम्बन्धों में और अधिक मजबूती आई। फरवरी 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति दो दिवसीय भारत यात्रा पर आए। इस दौरान अमेरिका ने भारत के साथ तीन अरब डॉलर का सैन्य समझौता किया। इस प्रकार वर्तमान में भारत-अमेरिका के पारस्परिक सम्बन्ध नवीन कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।
India and the United States have experienced periods of closeness and sometimes distance. A period of cordiality in relations between the two countries began in March 2000. After a 22-year period, the then US President Clinton’s five-day visit to India on March 21, 2000, marked a new turning point in India-US relations. The Indian Prime Minister’s visits to the US in September 2000, November 2001, and July 2005 brought closer and cordiality to relations between the two countries. A ten-year defense agreement was signed between the two countries in June 2005, while the agricultural cooperation agreement between the US and India in this historic year gave a new direction to the relationship. The historic civil nuclear energy cooperation agreement signed during US President Bush’s visit to India on March 2, 2006, will prove to be a milestone in relations between the two countries. The nuclear agreement was signed during Shri Narendra Modi’s visit to the US on October 2, 2014. The then US President Barack Obama was the chief guest on the 66th Indian Republic Day in 2015. In 2016, Indian Prime Minister Modi addressed the US Congress. Indian Prime Minister Narendra Modi’s visit to America on June 25-26, 2017 further strengthened the relations between the two countries. In February 2020, the US President visited India for two days. During this, America signed a military agreement worth three billion dollars with India. Thus, currently, India-US mutual relations are setting new records.
| पूछे जाने वाले प्रश्न
2026 के भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का क्या महत्व है?
फरवरी 2026 के अंतरिम समझौते के तहत भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया गया है, भारत ने 5 वर्षों में 500 अरब डॉलर की अमेरिकी खरीद के लिए प्रतिबद्धता जताई है, जिससे तनाव का समाधान होगा और आपूर्ति श्रृंखलाओं को बढ़ावा मिलेगा।
भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने वाले प्रमुख रक्षा अभ्यासों के नाम बताइए।
युद्ध अभ्यास (सेना, आतंकवाद विरोधी), मालाबार (क्वाड नौसेना, पनडुब्बी रोधी) और 10-वर्षीय एमडीपी ढांचा सह-उत्पादन और संयुक्त अभ्यास के माध्यम से चीन के खिलाफ अंतर-संचालनीयता को बढ़ाते हैं।
भारत-अमेरिका संबंधों में iCET की क्या भूमिका है?
महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर पहल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (TRUST/Pax Silica), सेमीकंडक्टर, क्वांटम और जैव प्रौद्योगिकी सहयोग को आगे बढ़ाती है, जिससे “मेक इन इंडिया” और लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं को शक्ति मिलती है।
शीत युद्ध: उत्पत्ति, विशेषताएँ, प्रभाव, शिथिलता तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन
12th Science के बाद क्या-क्या कर सकते हैं? जानिए इस पोस्ट में ?

