शीत युद्ध: उत्पत्ति, विशेषताएँ, प्रभाव, शिथिलता तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन

शीत युद्ध: उत्पत्ति, विशेषताएँ, प्रभाव, शिथिलता तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक एवं राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने शीत युद्ध को जन्म दिया। यह प्रत्यक्ष युद्ध नहीं, बल्कि शक्ति, हथियारों, प्रचार और प्रभाव बढ़ाने की होड़ थी। इसके कारण विश्व दो गुटों—पूँजीवादी और साम्यवादी—में विभाजित हो गया। हथियारों की दौड़, सैन्य गठबंधन तथा परमाणु युद्ध का खतरा इसके प्रमुख प्रभाव रहे। समय के साथ शांति वार्ताओं, आर्थिक चुनौतियों और सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध समाप्त हुआ। इसी दौरान गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने किसी भी महाशक्ति के गुट में शामिल हुए बिना शांति, सहयोग, स्वतंत्र विदेश नीति और विकासशील देशों के हितों की रक्षा का मार्ग अपनाया।

dwitiya vishwa yudh ke baad america aur soviet sangh ke beech vaicharik evam rajnitik pratispardha ne sheet yudh ko janm diya. yah pratyaksh yudh nahin, balki shakti, hathiyaron, prachar aur prabhav badhane ki hod thi. iske karan vishwa do guton—poonjivadi aur samyavadi—men vibhajit ho gaya. hathiyaron ki daud, sainya gathbandhan tatha parmanu yudh ka khatra iske pramukh prabhav rahe. samay ke saath shanti vartaon, aarthik chunautiyon aur soviet sangh ke vighatan se sheet yudh samapt hua. isi dauran gutnirpeksh aandolan ne kisi bhi mahashakti ke gut mein shamil hue bina shanti, sahyog, swatantra videsh niti aur vikassheel deshon ke hiton ki raksha ka marg apnaya.
शीत युद्ध: उत्पत्ति, विशेषताएँ, प्रभाव, शिथिलता तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन
शीत युद्ध: उत्पत्ति, विशेषताएँ, प्रभाव, शिथिलता तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन
  • सर्वप्रथम अमेरिकी विद्वान बनाई बारुच ने ‘शीत युद्ध’ शब्द का प्रयोग किया तथा जिसको प्रो. लिपमैन ने प्रचारित किया।
  • शीत युद्ध का प्रारम्भ दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् से ही हुआ ।
  • दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व में दो महाशक्तियों संयुक्त राज्य अमेरिका तथा समाजवादी सोवियत गणराज्य का प्रादुर्भाव हुआ।
  • पहली महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका ने विश्व के देशों को पूँजीवादी तथा दूसरी महाशक्ति सोवियत संघ ने साम्यवादी विचारधाराओं में विभक्त किया।
  • अधिकांश पश्चिमी यूरोपीय देश जहाँ अमरेरिका के अनुयायी थे, वहीं पूर्वी यूरोपीय देश सोवियत संघ के गुट में शामिल थे।
  • अप्रैल 1949 में अमेरिका ने उत्तर अटलांटिक सन्धि संगठन (नाटो) की स्थापना की थी जिसके प्रति उत्तर में सोवियत संघ के नेतृत्व में 1955 में ‘वारसा सन्धि’ स्थापित की गई।
  • 1962 में क्यूबा पर अमेरिकी हमले की आशंका के चलते सोवियत नेता निकिता खुश्चेव ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कराई।
  • शीत युद्ध का चरम बिन्दु ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ था।
  • दोनों महाशक्तियों के बीच हथियारों के परिसीमन के लिए अनेक दौर की वार्ताओं के दौरान अस्त्रों पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए अनेक समझौते किए गए।
  • भारत जैसे विकासशील देशों ने दोनों महाशक्तियों के गुटों से अलग रहने के लिए गुट निरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना की थी।
  • 1956 में जोसेफ ब्रॉज टीटो (युगोस्लाविया) पण्डित जवाहरलाल नेहरू (भारत) तथा गमाल अब्दुल नासिर (मिस्र) ने गुट निरपेक्ष आन्दोलन की आधारशिला रखी थी।
  • 1961 में बेलग्रेड में आयोजित प्रथम गुट निरपेक्ष सम्मेलन में जहाँ इसके 25 सदस्य थे वहीं वर्तमान में इसके 120 सदस्य हैं।
  • गुट निरपेक्ष आन्दोलन में सम्मिलित विकासशील देशों के समक्ष प्रमुख चुनौती अपने देश का आर्थिक विकास करना था।
  • गुट निरपेक्ष आन्दोलन तथा नवीन अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था ने दो ध्रुवीय विश्व को सशक्त चुनौती दी।

प्रश्न 1. शीत युद्ध की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर–          शीत युद्ध की विशेषताएँ

शीत युद्ध की प्रमुख विशेषताओं को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

  • यह द्वितीय विश्व युद्ध के नकारात्मक परिणामस्वरूप पैदा हुआ वाकयुद्ध था जिसमें बदले की भावना सर्वोपरि थी।
  • शीत युद्ध दो प्रतिद्वन्द्वी महाशक्तियों के मध्य तनावपूर्ण स्थिति थी जो मूल रूप से राजनीति युद्ध का स्वरूप धारण किए थी।
  • शीत युद्ध पूँजीवादी तथा साम्यवादी विचारधाराओं का समावेश था जिसमें प्रत्यक्ष संघर्ष माना जाता है।
  • शीत युद्ध में जासूसी, गोपनीय संधियाँ, सैनिक समझौते तथा प्रादेशिक गठबन्धन करके शक्ति का प्रसार करना सर्वोपरि है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों के राज्यों की राजनीतिक तथा गैर-राजनीतिक समस्याएँ शीत युद्ध रूपी प्रयोगशाला में हल की जाती है। (6) शीत युद्ध में परस्पर एक-दूसरे के विरुद्ध अधिक-से-अधिक झूठा प्रचार करने को कोई सीमा नहीं होती है।

प्रश्न 2. शीत युद्ध की उत्पत्ति के प्रमुख कारणों की विवेचना कीजिए।

उत्तर-                 शीत युद्ध की उत्पत्ति के कारण

शीत युद्ध की उत्पत्ति के लिए मुख्यतः निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे-

  • युद्धकालीन सन्देह एवं अविश्वास यूरोपीय राष्ट्रों को साम्यवादी क्रान्ति की सफलता से गहरा आघात लगा। सोवियत सरकार पाश्चात्य देशों के शत्रुतापूर्ण व्यवहार को विस्तृत नहीं कर पायी। इसी प्रकार सोवियत संघ की पूँजीवाद विरोधी नीतियों तथा समस्त विश्व में साम्यवाद के प्रसार के लक्ष्य से पाश्चात्य शक्तियाँ रूस से भयभीत थीं और सदैव सन्देह की दृष्टि से देखती थीं।
  • सैद्धान्तिक मतभेद शीत युद्ध को विकसित करने में परस्पर दो विरोधी विचारधाराओं का भी योगदान रहा। जहाँ अमेरिकी पूँजीवादी उदार लोकतन्त्रात्मक देश था, वहीं इसके ठीक विपरीत सोवियत संघ साम्यवादी एकदलीय व्यवस्था वाला देश था।
  • अमेरिका विरोधी प्रचार– द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् सोवियत समाचार पत्रों एवं रेडियो ने अमेरिका के खिलाफ जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया जिससे अमेरिका में व्यापक जन असन्तोष व्याप्त हो गया।
  • अणु बमों की गोपनीयता अमेरिका ने अणु बम के निर्माण के सम्बन्ध में इंग्लैण्ड की तो अवगत करा दिया था लेकिन सोवियत संघ से इस बात को गुप्त रखा था। इसी प्रकार जापान के हिरोशिमा एवं नागासाकी नगरों पर अणु बम की वर्षा करते समय अमेरिका ने इंग्लैण्ड से परामर्श किया था लेकिन इस सन्दर्भ में सोवियत संघ की पूर्णरूपेण अवहेलना की थी। सोवियत संघ ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हुए अपना अपमान समझा था।
  • सोवियत संघ का बारबार निषेधाधिकार का प्रयोग सोवियत संघ ने पाश्चात्य देशों (विशेषतया अमेरिका) के प्रस्तावों एवं नीतियों के खिलाफ बार-बार वीटो का प्रयोग करके उसके प्रस्तावों को रद्द कराया। इससे पाश्चात्य राष्ट्र सोवियत संघ के कट्टर विरोधी बन गए।
  • लैण्ड – लीज समझौते का समापन – लैण्ड लीज समझौते के आधार पर पाश्चात्य देशों द्वारा सोवियत संघ की आर्थिक मदद की जाती थी, जिसे पाश्चात्य शक्तियों ने अचानक रोक दिया। इसने शीत युद्ध को भड़काने में काफी योगदान दिया।

प्रश्न 3. अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर शीत युद्ध के पाँच प्रभावों को लिखिए

उत्तर-                  शीत युद्ध का प्रभाव अथवा परिणाम

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध का निम्नांकित प्रभाव पड़ा था-

  • विश्व दो गुटों में विभक्त – शीत युद्ध की वजह से विश्व राजनीति द्विध्रुवीय हो गई। सोवियत संघ तथा संयुक्त राज्य अमेरिका अलग-अलग गुटों का नेतृत्व करने लगे।
  • आतंक एवं अविश्वास में वृद्धि – शीत युद्ध की वजह से देशों के बीच परस्पर अविश्वास, आतंक, तनाव तथा प्रतिस्पर्द्धा इत्यादि की भावना को पुष्पित एवं पल्लवित होने का अवसर मिला।
  • आणविक युद्धों का खतरा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्रयुक्त किए गए आणविक हथियारों की विनाशलीला से दुनिया के सभी देश भयभीत हो गये थे। उन्हें यह भय सदैव सताता था कि शीत युद्ध में आणविक हथियारों को बनाने की प्रतिस्पर्द्धा शुरू हो गयी है। यदि इनको कभी प्रयोग करने की स्थिति बनी तो विश्व का महाविनाश हो जाएगा। यहाँ तक कि इनका निर्माणकर्ता भी शेष नहीं बचेगा।
  • शस्त्रीकरण की दौड़ तथा विश्व का यान्त्रिकीकरण शीत युद्ध की वजह से विश्व के अनेक देशों में हथियारों की अंधी दौड़ को बढ़ावा मिला, जिससे निःशस्त्रीकरण का मार्ग कठिन हो गया।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ की कमजोर स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर शीत युद्ध का एक प्रभाव यह पड़ा कि इसकी वजह से संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थिति निर्बल हो गयी थी।
  • निर्गुट आन्दोलन को प्रोत्साहन शीत युद्ध के दुष्परिणामों से रक्षार्थ विश्व में निर्गुट अथवा गुट निरपेक्ष आन्दोलन का उदय हुआ।
  • सैन्य सन्धियों का अस्तित्व शीत युद्ध के दौरान नाटो, सीटो, सेण्टो तथा वारसा पैक्ट इत्यादि जैसी अनेक सैनिक सन्धियों की गई थीं, जिससे शीत युद्ध में उष्णता आ गई।

प्रश्न 4. प्राचीन एवं नवीन शीत युद्ध में मुख्यतया कौनकौन से अन्तर थे ? समझाइए ।

उत्तर-                  प्राचीन एवं नवीन शीत युद्ध में अन्तर (भेद)

1979 के अन्त में अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप को अमेरिका द्वारा विश्व शान्ति हेतु खतरा बताया गया। इससे दोनों गुटों के मध्य एक नए शीत युद्ध को उदित कर दिया। संक्षेप में प्राचीन एवं नवीन शीत युद्ध के प्रमुख अन्तरों अथवा भेदों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

  • प्राचीन शीत युद्ध की अपेक्षाकृत नवीन शीत युद्ध अधिक भयंकर था।
  • जहाँ प्राचीन शीत युद्ध का केन्द्र यूरोप था, वहीं नवीन शीत युद्ध का केन्द्र बिन्दु एशिया हो गया था।
  • चीन प्राचीन शीत युद्ध में सम्मिलित नहीं था, जबकि नवीन शीत युद्ध में उसने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।
  • जहाँ प्राचीन शीत युद्ध में सोवियत संघ का मुकाबला सिर्फ अमेरिका से था, वहीं नवीन शीत युद्ध में उससे मुकाबला करने में अमेरिका का साथ चीन, ब्रिटेन तथा फ्रांस ने भी दिया था।
  • प्राचीन शीत युद्ध का ध्रुवीकरण नवीन शीत युद्ध में शिथिल पड़ गया तथा नवीन शीत युद्ध में चीन एवं फ्रांस के जुड़ जाने से शीत युद्ध की नीतियों में काफी बदलाव आए।
  • प्राचीन शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियाँ परमाणु युद्ध की पक्षधर नहीं थी, क्योंकि वे मानती थीं कि इससे दोनों राज्यों का विनाश हो जायेगा जबकि नवीन शीत युद्ध के दौरान दोनों यह मानने लगे थे कि सीमित परमाणु युद्ध लड़कर उन्हें विजित किया जा सकता है।
  • प्राचीन शीत युद्ध स्टालिन द्वारा सोवियत संघ को अमेरिका के बराबर बनाने हेतु किया गया था, जबकि नवीन शीत युद्ध अमेरिका ने अपने हथियार उद्योग का विकास करने के लिए किया था।

प्रश्न 5. शीत युद्ध की शिथिलता के कारणों को समझाकर लिखिए।

उत्तर-               शीत युद्ध की शिथिलता के कारण – 1947 से 1987 तक चले शीत युद्ध में शिथिलता आने के प्रमुख कारणों को संक्षेप में निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

  • उदारवादी विचारधाराएं – द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति अत्यधिक कट्टर थी। बाद में स्टालिन तथा दुमैन के उत्तराधिकारियों की समझ में यह बात घर कर गई कि कट्टरपंथी विचारधारा से दोनों को लाभ के स्थान पर हानि ही उठानी पड़ेगी। अतः उन्होंने अपनी कट्टरपंथी नीतियों का त्याग करके उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया, जिसने शीत युद्ध की शिथिलता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व – सोवियत संघ तथा संयुक्त राष्ट्र अमेरिकी नेताओं ने सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को स्वीकार किया गोबच्योव तथा बुश ने जिओ तथा जीने दो के सिद्धान्त को उचित माना जिससे शीत युद्ध को घटाने में मदद मिली।
  • तटस्थता की राजनीति- विश्व राजनीति में चल रही नई लहर के फलस्वरूप सैनिक गुटों के देश भी तटस्थता का समर्थन करने लगे थे नाटो के लिए फ्रांस अधिक धनराशि देने का इच्छुक नहीं रहा था तथा वह अधिकांश मामलों में तटस्थ ही रहना चाहता था। इसी तरह सोवियत संघ का प्रभावी पूर्वी यूरोप भी सोवियत मिसाइल के प्रति इच्छुक नहीं रहा था। इससे शीत युद्ध की विचारधारा शिथिल पड़ गयी।
  • निर्गुट आन्दोलन का प्रभाव – द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पण्डित नेहरू, मार्शल – टोटो तथा नासिर की त्रिमूर्ति ने विश्व को शीत युद्ध की विभीषिका से बचाने हेतु गुट निरपेक्ष नीति का निर्माण किया। धीरे-धीरे इस गुट निरपेक्ष नीति ने एक आन्दोलन का स्वरूप धारण कर लिया तथा इसमें सम्मिलित होने वाले देशों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती चली गई, जिससे यह तृतीय विश्व के रूप में उभरकर सामने आया। इस प्रकार निर्गुट आन्दोलन भी शीत युद्ध में कमी का कारण बन गया।
  • यूरोप में परिवर्तन की लहर – जर्मनी को बर्लिन दीवार का टूटना, पोलैण्ड में राजनीतिक कट्टरता की कमी तथा चेकोस्लोवाकिया एवं युगोस्लाविया में बन्धुत्व की भावना का विकास इत्यादि अनेक ऐसी घटनाएँ घटित हुई कि यूरोप में राजनीतिक सोच में आमूल-चूल परिवर्तन आया। इससे शीत युद्ध को कम करने का वातावरण बना।
  • सोवियत संघ की आर्थिक कमजोरी – 1980 के पश्चात् सोवियत संघ भारी आर्थिक तंगी से गुजरने लगा। अन्तरिक्ष अनुसंधान की प्रतिस्पर्द्धा हथियारों के निर्माण पर विपुल धनराशि खर्च करने से सोवियत अर्थव्यवस्था चरमरा गई उसमें अब इतनी शक्ति न बची थी कि वह 1 पाश्चात्य देशों से शीत युद्ध लड़ सके।
  • सोवियत संघ का विघटन -1991 में भारी उथल-पुथल के बाद सोवियत संघ का विघटन हो गया। विश्व राजनीति के इस घटनाचक्र ने शीत युद्ध को विराम लगा दिया।

प्रश्न 6. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की उपलब्धियों को लिखिए।

उत्तर-            गुट निरपेक्ष आन्दोलन की उपलब्धियाँ

संक्षेप में इस आन्दोलन की उपलब्धियों को अग्र प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बढ़ावा – इस आन्दोलन की वजह से विश्व में अनेक तनावों तथा संघर्षो को रोकने में सफलता मिली है, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बल मिला है। कोरिया युद्ध, इण्डोचीन संघर्ष, स्वेज युद्ध तथा क्यूबा संकट इत्यादि में। निरपेक्ष आन्दोलनकारी देशों ने संघर्ष को समाप्त करके समझौता कराने में महती भूमिका का निर्वहन किया है।
  • शीत युद्ध को समाप्त कराने में सहायक – शीत युद्ध के दौरान दोनों ही खेमों में तनाव बढ़ने से शस्त्रीकरण को अन्धी प्रतिस्पर्द्धा होने लगी थी, जो अघोषित युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर रही थी। इस तनाव को कम करने में गुट निरपेक्ष आन्दोलन की उल्लेखनीय भूमिका रही थी।
  • निःशस्त्रीकरण में सहायक – गुट निरपेक्ष देशों ने निःशस्त्रीकरण तथा शस्त्र नियन्त्रण हेतु विचार-विमर्श की भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। भारत ने 1954 में आणविक हथियारों के परीक्षण पर जो प्रतिबन्ध के प्रस्ताव रखे थे, वे 1963 में आणविक परीक्षण सन्धि के रूप में फलीभूत हुए।
  • अपनी स्वतन्त्र नीति का अनुसरण – गुट निरपेक्ष आन्दोलन के सदस्य देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतन्त्र नीति का अनुसरण किया। अफगानिस्तान, कम्पूचिया वियतनाम तथा क्यूबा संकट के दौरान आन्दोलन के सदस्य देश भारत ने अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति का परिचय दिया था।
  • आर्थिक सहयोग को बढ़ावा अविकसित राष्ट्रों के बीच आर्थिक सहयोग की आधारशिला रखने में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को सफलता मिली। कोलम्बो शिखर सम्मेलन में एक आर्थिक घोषणा पत्र स्वीकारा गया। इसका मुख्य आधार गुट निरपेक्ष देशों के बीच अधिक से अधिक आर्थिक सहयोग करना था। वर्तमान में गुट निरपेक्ष आन्दोलन के सदस्य राष्ट्र नवीन अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के मार्ग पर अग्रसर हैं।

प्रश्न 7. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की असफलता पर एक लेख लिखिए।

        ( Write an essay on the failure of the Non-Aligned Movement )

उत्तर-               गुट निरपेक्ष आन्दोलन की असफलता अथवा कमजोरियाँ

गुट निरपेक्ष आन्दोलन की असफलताओं अथवा कमजोरियों को संक्षेप में निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-

  • सिद्धान्तहीन आन्दोलन – गुट निरपेक्षता एक अवसरवादी एवं कार्य निकालने की नीति है, क्योंकि इस आन्दोलन से सम्बद्ध देश सिद्धान्तहीन है। साम्यवादी तथा पूँजीवादी गु के साथ अपने सम्बन्धों के सन्दर्भ में वे दोहरा मापदण्ड प्रयुक्त करते हैं। उनका ध्येय पश्चिमी एवं साम्यवादी दोनों गुटों से अधिकाधिक लाभ अर्जित करना है।
  • बाहरी आर्थिक एवं रक्षा सहायता पर निर्भरता – गुट निरपेक्षता आन्दोलन की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इससे सम्बद्ध देश अपनी आर्थिक एवं रक्षा सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य देशों पर आश्रित है। सच्ची गुटनिरपेक्षता का आधार आर्थिक निर्भरता है। यदि कोई देश किसी प्रकार की सहायता हेतु अन्य राष्ट्रों पर आश्रित है, तो इसका आशय यह है कि उस देश की स्वतन्त्रता एवं गुटनिरपेक्षता को उसने दाँव पर लगा दिया है। उदाहरणार्थ- भारतीय नीतियाँ विश्व बैंक के दिशा निर्देशों के अनुरूप बनायी जाती है।
  • विभाजित आन्दोलन-गुट निरपेक्ष आन्दोलन अन्य देशों को संगठित करने के स्थान पर स्वयं ही विभाजित है। 1979 के हवाना सम्मेलन में यह तीन भागों में विभक्त था। यह विभाजन प्रमाणित करता है कि गुट निरपेक्ष आन्दोलन दिशाहीन है तथा महाशक्तियाँ इसे अपने हाथों में खिलौने की भाँति प्रयोग करती हैं।
  • ठोस योजना का अभाव- गुट निरपेक्ष आन्दोलन से सम्बद्ध देशों में मौलिक एकता का अभाव है। समृद्ध राष्ट्रों के शोषण के खिलाफ मोर्चाबन्दी करना तो काफी दूर रहा वे आपस मैं एक-दूसरे की मदद करने की कोई ठोस योजना भी निर्मित नहीं कर पाए हैं।
  • समकालीन अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था – शीत युद्ध की समाप्ति, सोवियत संघ के बिखराव, जर्मनी एकीकरण, वारसा सन्धि के समाप्त होने तथा नवीन राष्ट्रों के प्रादुर्भाव इत्यादि ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की हवा चला दी है। चूँकि गुट निरपेक्ष आन्दोलन का प्रमुख कार्य विश्व को गुटों के विभाजन से मुक्त कराना था तथा अब विश्व में एकलध्रुवीय व्यवस्था है, तो ऐसी परिवर्तित स्थिति में यह आन्दोलन निरर्थक हो गया है। इसके आलोचकों का अभिमत है कि या तो गुट निरपेक्ष आन्दोलन को समाप्त करना पड़ेगा अथवा किसी नवीन आन्दोलन में परिवर्तित करना पड़ेगा।
  • Unprincipled Movement – Non-Alignment is an opportunistic and expedient policy, as the countries associated with this movement are unprincipled. They use double standards in their relations with communist and capitalist blocs. Their goal is to maximize profits from both the Western and communist blocs.
  • Dependence on External Economic and Defense Assistance – A major weakness of the Non-Aligned Movement is that its associated countries are dependent on other countries to meet their economic and defense needs. The foundation of true non-alignment is economic dependence. If a country relies on other nations for any kind of assistance, it means that it has put its independence and non-alignment at stake. For example, Indian policies are formulated in accordance with World Bank guidelines.
  • Divided Movement – Instead of uniting other countries, the Non-Aligned Movement is itself divided. At the 1979 Havana Conference, it was divided into three parts. This division proves that the Non-Aligned Movement is directionless and is used as a toy by the superpowers.
  • Lack of a Concrete Plan – The countries associated with the Non-Aligned Movement lack fundamental unity. Forget about forming a front against the exploitation of rich nations, they have not even been able to formulate a concrete plan to help each other.
  • Contemporary International System – The end of the Cold War, the disintegration of the Soviet Union, the unification of Germany, the end of the Warsaw Pact, and the emergence of new nations have brought about a wave of change in the international political system. Since the Non-Aligned Movement’s primary objective was to free the world from bloc divisions, and now the world exists in a unipolar system, the movement has become meaningless in this changed situation. Its critics believe that the Non-Aligned Movement must either be abolished or transformed into a new movement.

प्रश्न 8. गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में भारत का योगदान स्पष्ट कीजिए

                (Explain India’s contribution to the Non-Aligned Movement.)

अथवा

भारत का गुट निरपेक्ष आन्दोलन में क्या योगदान है ?

उत्तर-                 गुट निरपेक्ष आन्दोलन में भारत का योगदान

गुट निरपेक्ष आन्दोलन के प्रथम शिखर सम्मेलन से लेकर 18वें शिखर सम्मेलन तक उसे नया आयाम देने में भारत ने जो कुछ किया है वह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। भारत ने गुट- निरपेक्ष देशों का 7वाँ शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित किया, जिसमें 101 सदस्य देशों ने हिस्सा लिया था। इस सम्मेलन के घोषणा-पत्र में विकासशील तथा विकसित देशों की सामूहिक आत्मनिर्भरता को गति देने की वचनबद्धता घोषित की गई थी।

4-7 सितम्बर, 1989 को बेलग्रेड में आयोजित नौवें निर्गुट शिखर सम्मेलन में भारतीय दृष्टिकोण को सभी प्रमुख घोषणाओं में विशेष महत्त्व दिया गया था। इस दौरान तत्कालीन प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी द्वारा जो भी प्रस्ताव रखे गए, गुट निरपेक्ष शिखर सम्मेलन में उन्हें यथारूप में स्वीकृत कर लिया गया।

1-6 सितम्बर, 1992 को जकार्ता शिखर सम्मेलन के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री पी. वी. नरसिम्हाराव ने आतंकवाद के विरुद्ध कठोर रवैया अपनाने का सदस्य देशों से आह्वान किया, जिसके परिणामस्वरूप सम्मेलन की अन्तिम घोषणा में आतंकवाद की कड़ी निन्दा की गयी थी। काटीजिना में 18-20 अक्टूबर, 1995 को आयोजित 11वें निर्गुट शिखर सम्मेलन में भारतीय पहल पर सम्मेलन की घोषणा में आतंकवादी कार्यवाहियों की स्पष्ट शब्दों में भर्त्सना की गई।

सितम्बर, 1998 में डरबन में आयोजित 12वें गुट निरपेक्ष शिखर सम्मेलन में भारत के नाभिकीय परीक्षणों का खुलासा करते हुए तत्कालीन प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नाभिकीय हथियार सम्पन्न देशों से अनुरोध किया कि वे इनके अभिसमय पर वार्ता हेतु गु निरपेक्ष आन्दोलन के साथ सम्मिलित हों।

24-25 फरवरी, 2003 को कुआलालम्पुर में सम्पन्न 13वें गुट निरपेक्ष आन्दोलन के शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रयासों के फलस्वरूप ही आतंकवाद से निबटने हेतु विश्व सम्मेलन आयोजित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग का आह्वान किया गया था। 16-17 सितम्बर 2006 को हवाना में हुए 14वें निर्गुट सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भाग लिया था तथा अफगानिस्तान के दक्षिण एवं पूर्वी भागों में आतंकवादियों के संगठित होने  पर गहरी चिन्ता व्यक्त की गई थी।

गुट निरपेक्ष देशों के 15वें शिखर सम्मेलन 15-16 जुलाई, 2009 के दौरान मिस्र के शर्म-अल-शेख में भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दुनिया को मुद्रा अवस्फीति की चेतावनी देते हुए आतंकवाद का मुद्दा उठाते हुए कहा था कि अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद की रोकथाम के लिए एक व्यापक सन्धि की आवश्यकता है।

तेहरान (ईरान) में अगस्त 2012 में सम्पन्न 16वें शिखर सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सीरिया संकट के शान्तिपूर्ण समाधान का पक्ष लेते हुए फिलीस्तीन का समर्थन किया। 17वें शिखर सम्मेलन में भारतीय शिष्ट मण्डल का प्रतिनिधित्व प्रधानमन्त्री के स्थान पर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी द्वारा किया गया। 18 सितम्बर, 2016 को सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए भारतीय उपराष्ट्रपति ने आतंकवाद पर तीखे प्रहार करते हुए ‘नाम’ के अन्तर्गत आतंकवाद से निपटने हेतु एक कार्य दल गठित करने पर बल दिया।

18वें गुट निरपेक्ष शिखर सम्मेलन में बाकू ( अजरबेजान) में 25 अक्टूबर, 2019 को भारतीय उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने दुनिया के सामने स्पष्ट शब्दों में आतंकवाद के खिलाफ कठोर कार्यवाही को समय की आवश्यकता बताया।

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