mp board 12th Chapter -5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप [Patterns of Social Inequality and Exclusion]

अध्याय   5

सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप [Patterns of Social Inequality and Exclusion]

महत्वपूर्ण बिन्दु

  • असमानता या विषमता एक ऐसी दशा है जिसमें कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में धन, सम्पत्ति, स्वास्थ्य, शिक्षा और शक्ति प्राप्त करने के अधिक अवसर मिल जाते हैं।
  • बहिष्कार वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कुछ समूहों को विभिन्न अधिकारों से इस तरह वंचित कर दिया जाता है कि वह स्वयं अपनी स्थिति में सुधार करने के योग्य नहीं रह जाते ।
  • पूर्वाग्रह – एक समूह के सदस्यों द्वारा दूसरे समूह के बारे में पूर्वकल्पित विचार या व्यवहार को पूर्वाग्रह कहते हैं। अर्थात् वह धारणा जो बिना विषय को जाने और बिना परखे ही बना ली जाती हैं।
  • पूर्वाग्रह अपरिवर्तनीय, कठोर और रूढ़िबद्ध धारणाओं पर आधारित होते हैं। • भेदभाव – दूसरे समूह अथवा व्यक्ति के प्रति किया गया व्यवहार भेदभाव कहलाता है, जैसे-एक समूह के सदस्य उन अवसरों के लिए अयोग्य करार दिये जायें जाए जो दूसरे के लिए खुले होते हैं । अर्थात् व्यक्ति को लिंग, धर्म, जाति के आधार पर अलग समझना।
  • जाति – एक भेदभाव पूर्ण विशिष्ट भारतीय सामाजिक संस्था है जो विशेष जातियों में पैदा र व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण व्यवहार को लागू करती है और उसे न्यायसंगत हुए ठहराती है।
  • प्रत्येक जाति का सामाजिक अधिक्रम में एक विशेष स्थान होता था तथा प्रत्येक जाति एक व्यवसाय से जुड़ी थी।
  • अस्पृश्यता- धार्मिक एवं कर्मकांडीय दृष्टि से शुद्धता एवं अशुद्धता के पैमाने पर सबसे नीची मानी जाने वाली जातियों के सदस्यों के विरुद्ध अत्यन्त कठोर सामाजिक दण्डों का विधान करता है, उसे अस्पृश्यता कहते हैं।
  • अस्पृश्यता के तीन आयाम हैं, अपवर्जन या बहिष्कार, अनादर एवं अधीनता, शोषण।
  • दलित-दलित अछूत समझी जाने वाली उन सभी शोषित जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयुक्त होता है जो हिन्दू धर्मशास्त्रों द्वारा हिन्दू समाज व्यवस्था में चौथे पायदान पर स्थित है।
  • आरक्षण सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए सीट आरक्षित करना जिस पर उच्च वर्ग का कोई अधिकार न हो। यह आरक्षण शैक्षिक संस्थाओं, रोजगार, संसद आदि में उपलब्ध है तथा इन्हें आयु सीमा में छूट और चयन प्रक्रिया में अंकों में भी छूट मिलती है।
  • गैर-सरकारी प्रयास व सामाजिक आन्दोलन ज्योतिबा फुले, पेरियार, सर सैयद अहमद खान, डॉ. आम्बेदकर, महात्मा गाँधी, राजा राममोहन राय आदि के द्वारा किए गए।
  • अन्यथा सक्षम – अन्यथा सक्षम लोगों का तात्पर्य उन लोगों से है जिनमें देखने, बोलने, सुनने, चलने फिरने अथवा मानसिक आधार पर दोष होते हैं। इन्हीं को विकलांग लोग कहते हैं।

Chapter -5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप [Patterns of Social Inequality and Exclusion]

mp board Class 12 Sociology Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप के असमानता, बहिष्कार, आरक्षण एवं सामाजिक आंदोलनों की जानकारी….

पाठान्त प्रश्नोत्तर

 

प्रश्न 1. सामाजिक विषमता व्यक्तियों की विषमताओं से कैसे भिन्न है?

उत्तर – सामाजिक असमानता का अर्थ सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच की पद्धति से है, जहाँ कुछ लोग संसाधनों के द्वारा विभिन्न अवसरों का लाभ उठाते हैं। जबकि कुछ लोग इससे वंचित रह जाते हैं। सम्पत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अवस्था के मामलों में कुछ लोगों का स्तर बहुत ऊँचा है, जबकि कुछ लोगों का बहुत ही निम्न स्थान है। जबकि व्यक्तिगत असमानता से तात्पर्य व्यक्तियों की मानसिक तथा शारीरिक विशेषताओं में विचलन तथा विध्वंस से है। कोई व्यक्ति असाधारण बुद्धिमान या प्रतिभावान हो सकता है। सामाजिक विषमता, सामाजिक स्तरीकरण, पूर्वाग्रह, भेदभाव आदि से प्रकट होती है। ये प्राकृतिक नहीं वरन् उस समाज द्वारा उत्पन्न की जाती है जिसमें वे रहते हैं।

 

प्रश्न 2. सामाजिक स्तरीकरण की कुछ विशेषताएँ बताइए।

उत्तर-सामाजिक स्तरीकरण की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) सामाजिक स्तरीकरण व्यक्तियों के बीच विभिन्नता का कारण नहीं बल्कि सामाजिक संसाधन विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में असमान रूप से बँटा होता है। जैसे आदिम समाज शिकारी संग्रहकर्ता समाज में थोड़ा उत्पादन करते हैं वही तकनीकी रूप से अधिक उन्नत समाज में जहाँ लोग अपनी मूलभूत जरूरतों से अधिक उत्पादन करते हैं।

(2) सामाजिक स्तरीकरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी होता है। यह परिवार और सामाजिक संसाधनों के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में उत्तराधिकार के रूप में घनिष्ठता से जुड़ा है। अर्थात् बच्चे अपने माता-पिता की सामाजिक स्थिति को पाते हैं। (3) सामाजिक स्तरीकरण को विश्वास या विचारधारा द्वारा समर्थन मिलता है।सामाजिक स्तरीकरण की कोई भी व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहीं चल सकती जब तक कि व्यापक तौर पर यह माना न जाता हो कि वह या तो न्यायसंगत है या अपरिहार्य है।

 

प्रश्न 3. आप पूर्वाग्रह और अन्य किस्म की राय अथवा विश्वास के बीच भेद कैसे करेंगे?

उत्तर-पूर्वाग्रह एक समूह के सदस्यों द्वारा दूसरे समूह के बारे में पूर्वकल्पित विचार अथवा व्यवहार से होता है। अर्थात् वह धारणा जो बिना विषय को जाने और बिना उसके तों को परखे प्रारम्भ में ही बना ली जाती है। एक पूर्वग्रह के पूर्वकल्पित विचार सबूत साक्ष्यों के विपरीत सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होते हैं। यह नई जानकारी प्राप्त होने के बावजूद बदलने से इंकार करते हैं। पूर्वाग्रह सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों हो सकते है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति अपनी जाति और समूह के सदस्यों के पक्ष में पूर्वाग्रहित हो सकता है और उन्हें बिना किसी सबूत के दूसरी जाति या समूह से श्रेष्ठ मान सकता है। दूसरी तरफ इस सम्बन्ध में किसी भी व्यक्ति के लिए जो राय या अवधारणा बनती है वह जानकारी या तथ्यों पर आधारित नहीं होती बल्कि सोच के आधार पर होती है।

 

प्रश्न 4. सामाजिक अपवर्जन या बहिष्कार क्या है?

उत्तर- सामाजिक अपवर्जन या बहिष्कार वह तौर-तरीके हैं, जिनके जरिए किसी व्यक्ति या समूह को समाज में पूरी तरह घुलने-मिलने से रोका जाता है व अलग या पृथक् रखा जाता है। जो व्यक्ति या समूह को उन अवसरों से वंचित करते हैं जो अधिकांश जनसंख्या के लिए खुले होते हैं। भरपूर तथा क्रियाशील जीवन जीने के लिए व्यक्ति को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (जैसे रोटी, कपड़ा तथा मकान) के अलावा अन्य आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात के साधन, बीमा, सामाजिक सुरक्षा, बैंक) की भी जरूरत होती है। सामाजिक भेदभाव आकस्मिक या अनायास रूप से नहीं बल्कि व्यवस्थित तरीके से होता है, अनैच्छिक होता है।।

 

प्रश्न 5. आज जाति और आर्थिक असमानता के बीच क्या सम्बन्ध है?

उत्तर- प्राचीन समय में जाति और आर्थिक असमानता एक-दूसरे से सम्बन्धित थी। व्यक्ति की सामाजिक स्थिति तथा आर्थिक स्थिति एक दूसरे के अनुरूप थी जैसे उच्च जाति के लोगों की आर्थिक स्थिति अच्छी होती थी और निम्न जातियों के लोगों की आर्थिक स्थिति निम्न होती थी। परन्तु आधुनिक समय में जाति तथा व्यवसाय के सम्बन्धों में परिवर्तन आ चुका है। आज प्रत्येक व्यक्ति कोई भी व्यवसाय योग्यता के आधार पर अपना सकता है। आ धुनिक समय में अमीर तथा गरीब प्रत्येक जाति में मिल जाएँगे। जाति व्यवस्था के कमजोर होने से सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति वाली जातियों के बीच अन्तर कम हो गया है। परन्तु अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक समूहों के बीच जातीय अन्तर अभी भी मौजूद हैं।

 

प्रश्न 6. अस्पृश्यता क्या है?

उत्तर-अस्पृश्यता’ जिसे आम बोलचाल में छुआछूत कहा जाता है, जिसके अन्तर्गत है कि उनके स्पर्श करने से भी लोग अशुद्ध हो जाएंगे जाति व्यवस्था के अधिक्रम में निचली जातियाँ सबसे नीचे मानी जाती थीं। निचली जातियाँ सामाजिक संस्थाओं से बहिष्कृत कर दी गई। यह जाति व्यवस्था का अत्यधिक जटिल पहलू है।

 

प्रश्न 7. जातीय विषमता को दूर करने के लिए अपनाई गई कुछ नीतियों वर्णन कीजिए।

उत्तर-जातीय विषमता को दूर करने के लिए ‘राज्य’ यानि भारत सरकार ने का

नीतियाँ अपनाई जो कि निम्नवत् हैं-

(I) जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850-इस अधिनियम में यह व्यवस्था थी कि केवल धर्म या जाति के आधार पर ही नागरिकों के अधिकारों को कम नहीं किया जाएगा। यह अधिनियम दलितों को विद्यालय में प्रवेश की अनुमति देता है।

(2) संविधान संशोधन (930) अधिनियम, 2005 – इस अधिनियम के द्वारा उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है।

(3) अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 1983- इस अधिनियम के छुआछूत का उन्मूलन (अनुच्छेद 17 ) तथा आरक्षण का प्रावधान है।

(4) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989- इस अधिनियम में दलितों तथा आदिवासियों के अधिकारों हेतु मजबूत कानूनी प्रावधान किए गए हैं।

 

प्रश्न 8. अन्य पिछड़े वर्ग, दलितों (या अनुसूचित जातियों) से भिन्न कैसे हैं?

उत्तर– जातियों का एक बड़ा समूह जिन्हें नीचा समझा जाता था। उनके साथ तरह-तरह के भेदभाव किये जाते थे ये सेवा करने वाले शिल्पी (कारीगर) जातियों के लोग थे जिन्हें जाति-सोपान में नीचा स्थान प्राप्त था। लेकिन भारतीय संविधान में यह स्वीकार किया गया है कि अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के अलावा और भी कई समूह हैं जो सामाजिक असुविधाओं से पीड़ित हैं। ऐसे समूह का जाति पर आधारित होना जरूरी नहीं है। लेकिन वे आमतौर पर सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हैं, जिन्हें अन्य पिछड़े वर्ग के नाम से जाना जाता है। पिछड़ेपन की चार कसौटियों पर इन्हें पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया- (1) जातीय संस्तरण में निम्न स्थान (2) शिक्षा का अभाव, (3) सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व, तथा (4) व्यापार व उद्योगों में कम प्रतिनिधित्व ।

 

प्रश्न 9. आज आदिवासियों से सम्बन्धित बड़े मुद्दे कौन से हैं?

उत्तर- जनजातियाँ या आदिवासी हमारे समाज, सभ्यता तथा संस्कृति से दूर रहती है जिस कारण उनसे सम्बन्धित मुद्दे अलग प्रकृति के हैं। उनसे सम्बन्धित मुद्दे निम्नवत् है-

(1) जनजातियों का शोषण – अंग्रेजों के शासन के समय कबायली लोग हमारे समाज के सम्पर्क में आना शुरू हुए। ये आदिवासी अपनी ही संस्कृति में रहते हैं, किसी और में हस्तक्षेप नहीं करते। अंग्रेजी शासन व्यवस्था में अंग्रेजों ने डाक तार की तारें बिछाने का कार्य शुरू किया तो वो इलाके आदिवासियों के थे जिसका आदिवासियों ने हिंसात्मक विरोध किया। इससे नाराज होकर अंग्रेजों ने साहूकारों तथा जमींदारों को कबायली लोगों का शोषण करने के लिए प्रेरित किया। इससे इन लोगों का जीवन-स्तर निम्न हो गया। उन्हें उनके स्थानों से अलग कर दिया गया।

f2) निर्धनता – आदिवासी लोग हमारी सभ्यता से दूर पहाड़ों, जंगलों, घाटियों इत्यादि में रहते हैं। इन लोगों का कोई वर्ग नहीं होता। यह साधारण जीवन व्यतीत करते हैं। परन्तु हमारे समाज के सम्पर्क में आने से लोगों ने इनका शोषण किया और यह निर्धन से और निर्धन हो गए।

(3) अलग-थलग करने की नीति- अंग्रेजों ने प्रशासनिक कारणों से उन्हें अलग-थलग करने की नीति अपनाई जिससे वह समाज में पिछड़ते ही चले गए।

(4) मध्यस्थ रास्ता – स्वतन्त्रता के बाद संविधान ने सभी नागरिकों तथा समूहों की प्रगति का निर्देश सरकार को दिया इसलिए उनके क्षेत्र में न केवल प्रगति के अवसर उत्पन्न किए बल्कि उनकी संस्कृति का भी ध्यान रखा गया। परन्तु ये परम्परागत कार्यों से दूर होने के कारण सामाजिक सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाए हैं।

 

प्रश्न 10. नारी आन्दोलन ने अपने इतिहास के दौरान कौन-कौन से मुख्य मुद्दे उठाए हैं?

उत्तर- भारत में 16वीं और 17वीं शताब्दी में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार के प्रयास किए गए। भारत में महिला आन्दोलन का प्रारम्भ सामाजिक सुधार आन्दोलन के एक हिस्से से शुरू हुआ राजा राममोहन राय ने सामाजिक, धार्मिक दशाओं तथा स्त्रियों की दुरावस्था में सुधार के लिए बंगाल में प्रयास किए। उन्होंने ‘सती प्रथा’ के विरुद्ध अभियान चलाया। ज्योतिबा फुले एक सामाजिक बहिष्कृत जाति के थे और उन्होंने जातिगत तथा लैंगिक दोनों ही विषमताओं पर प्रहार किया। उन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना की। सर सैय्यद अहमद खान ने मुस्लिम समुदाय के कल्याण हेतु कदम उठाए। वे लड़कियों की शिक्षा के प्रेरक थे। ताराबाई शिंदे ने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ नामक किताब लिखी।

 

स्वतन्त्रता के पश्चात् महिलाओं के उत्थान से सम्बन्धित कई प्रकार के कानून बनाए गए ताकि उन्हें शिक्षा, मातृत्व लाभ, जायदाद सम्बन्धी अधिकार दिए जाएँ। समय-समय पर महिलाओं के शोषण, बलात्कार, छेड़छाड़, वैवाहिक हिंसा, प्रतिकूल लिंग अनुपात, दहेज इत्यादि कई मद्दे हैं, जिन्हें आधुनिक समय में उठाया जा रहा है ताकि महिलाओं को इन सबसे मुक्ति दिलाई जा सके।

 

प्रश्न 11. हम यह किस अर्थ में कह सकते हैं कि ‘असक्षमता’ जितना शारीरिक है, उतनी ही सामाजिक भी?

उत्तर-अक्षम (असक्षम) लोग इसलिए ‘अक्षम’ नहीं होते कि वे शारीरिक या मानसिक रूप से बाधित होते हैं, बल्कि इसलिए भी अक्षम होते हैं कि समाज उनकी जरूरतों को पूरा नहीं करता। भारतीय सन्दर्भ में निर्योग्यता एवं विकलांगता आन्दोलन के अग्रणी सक्रियतावादियों और विद्वानों में से एक हैं अनीता घई। उनके अनुसार,

  • निर्योग्यता / अक्षमता एक जैविक कमजोरी माना जाता है।
  • जब कभी अक्षम व्यक्ति के समक्ष कई समस्याएँ खड़ी होती हैं तो यह मान लिया जाता है कि उसकी ये समस्या/बाधा शारीरिक या मानसिक अक्षमता का परिणाम है।अक्षम व्यक्ति को हमेशा शिकार यानि पीड़ित व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। • यह माना जाता है कि निर्योग्यता उस निर्योग्य व्यक्ति के अपने प्रत्यक्ष ज्ञान से जुड़ी है।
  • निर्योग्यता का भाव भी यह दर्शाता है कि निर्योग्य व्यक्ति को सहायता की आवश्यकता है।
  • भारतीय संस्कृति में शारीरिक पूर्णता का आदर किया जाता है तथा शारीरिक पूर्णत न होने की स्थिति को दोष तथा खराबी का लक्षण माना जाता है और उसे बेचारा कहकर सम्बोधित किया जाता है।

 

  • शारीरिक अक्षमता को पिछले कर्मों का फल, भाग्य का दोष मानते हैं। अक्षम लोग इन सभी कारणों से जैविक अक्षम नहीं होते, बल्कि सामाजिक अक्षम माने जाते हैं।

अक्षमता तथा गरीबी के बीच गहरा सम्बन्ध होता है। कुपोषण, अपर्याप्त प्रतिरक्षण कार्यक्रम समाज से कट जाने के कारण गरीबी का शिकार होने लगते हैं। अक्षम लोगों की शैक्षिक विमर्शो में शामिल करने की विचारधारा आज भी प्रायोगिक प्रक्रिया में है जो कि कुछ सरकारी स्कूलों तक ही सीमित है।

 

बहुविकल्पीय प्रश्न

  1. जातिवाद व्यवस्था-

(A) विभिन्न जातियों के बीच वैमनस्य पैदा करती है, (B) विभिन्न जातियों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम करती है,

(C) राष्ट्रभक्ति की भावना पैदा करती है,                    (D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

 

  1. भारत में क्षेत्रवाद ने-

(A) देश की अखण्डता को बढ़ाया,                 (B) देश की अखण्डता के लिए खतरा उत्पन्न किया,

(C) आर्थिक तथा सामाजिक विकृति दी,           (D) उपर्युक्त सभी।

 

  1. दहेज विरोधी विधेयक कब पारित किया गया?

(A) 1950,        (C) 1956,

(B) 1961,          (D) 1960

 

  1. हिन्दू विवाह अधिनियम कब पारित किया गया?

(A) 1955 ई. में,               (C) 1971 ई. में

(B) 1960 ई. में,              (D) 1975 ई. में ।

 

  1. अस्पृश्यता निवारण अधिनियम कब पारित किया गया ?

(A) 1950, (C) 1955,

(B) 1951.    (D) 1960

 

  1. विशेष विवाह अधिनियम कब पारित किया गया?

(A) 1954,      (B) 1955,

(C) 1956,       (D) 1957

 

  1. निम्नांकित में सामाजिक आन्दोलन के अन्तर्गत नहीं आएगा?

(A) जाति प्रथा,        (C) किसान आन्दोलन,

(B) सती प्रथा,         (D) नारी मुक्ति आन्दोलन।

 

  1. किसी सामाजिक समस्या को दूर करने हेतु एक वृहत जनसमुदाय द्वारा किया गया सामूहिक प्रयास कहलाता है-

(A) आर्थिक आन्दोलन,       (C) पर्यावरण आन्दोलन,

(B) सामाजिक आन्दोलन,    (D) ये सभी।

 

  1. निम्नांकित में आर्थिक आन्दोलन के अन्तर्गत आता है-

(A) किसान आन्दोलन,    (C) नेशनल फिश वर्क्स आन्दोलन,

(B) मजदूर आन्दोलन,     (D) ये सभी।

 

  1. संविधान के अनुच्छेद 29 व 30 के अनुसार किस आधार पर अल्पसंख्यकों को संरक्षण दिया गया है?

(A) धर्म,        (D) प्रान्त।

(B) भाषा,       (C) जाति,

 

  1. अनुच्छेद 30 में धर्म और भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यकों को कौन-सी संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार है?

(A) धार्मिक,        (C) सांस्कृतिक,

(B) आर्थिक,        (D) शिक्षण

 

  1. भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना किस सन् में की गई?

(A) 1985,              (C) 1970,

(B) 1992,              (A) 1980

 

  1. सती प्रथा के विरुद्ध किसने आन्दोलन चलाया ?

(A) महात्मा गाँधी ने,            (B) राजा राममोहन राय ने

(C) स्वामी विवेकानन्द ने,      (D) दयानन्द सरस्वती ने ।

 

  1. बाल विवाह विरोध अधिनियम कब पारित किया गया?

(A) 1929 ई. में,             (C) 1931 ई. में,

(B) 1930 ई. में.            (D) 1932 ई. में

 

  1. मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम कब पारित किया गया ?

(A) 1938,        (C) 1940,

(B) 1939.       (D) 1945.

 

  1. हिन्दू विवाह तथा विवाह विच्छेद अधिनियम कब पारित किया गया ?

(A) 1950,     (C) 1954,

(B) 1952,     (D) 1955.

 

  1. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम कब पारित किया गया?

(A) 1955,          (C) 1957,

(B) 1956,          (D) 1958.

 

  1. हिन्दू नाबालिग तथा संरक्षकता अधिनियम कब पारित किया गया ?

(A) 1956,          (C) 1958,

(B) 1957,          (D) 1959.

 

  1. हिन्दू गोद लेना तथा भरण-पोषण अधिनियम कब पारित किया गया ?

(A) 1960,                   (B) 1958,

(C) 1956.                   (D) 1967.

 

  1. विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करते हुए किसने आन्दोलन चलाया ?

(A) ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने,           (C) एनी बेसेण्ट ने,

(B) स्वामी विवेकानन्द ने,                (D) दयानन्द सरस्वती ने ।

 

उत्तर- 1. (A), 2. (B), 3. (C), 4. (A), 5. (C), 6. (A), 7. (C), 8. (B), 9. (D ),10. (C), 11. (D), 12. (B), 13. (B), 14. (A), 15. (B), 16. (D), 17. (B) 18. (A), 19. (C), 20. (A).

 

रिक्त स्थान पूर्ति

 

  1. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष—————- हैं।
  2. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को ——————के समकक्ष शक्तियाँ प्राप्त हैं।
  3. वर्तमान समय में अनुसूचित जातियों की प्रमुख निर्योग्यताएँ सामाजिक एवं————- हैं।
  4. भारत सरकार द्वारा अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम सन् ————— गया।
  5. मेघालय का खासी समुदाय आज————- भी है।
  6. दलित शब्द की तरह ———शब्द भी राजनीतिक जागरूकता और अधिकारों की लड़ाई का सूचक बन गया है।
  7. कोई सरकारी कार्यवाही अकेले ही————– नहीं ला सकती।
  8. प्रत्येक प्रकार का सामूहिक प्रयास ————–आन्दोलन नहीं हो सकता।
  9. सामाजिक आन्दोलन एक————- क्रमबद्ध है।
  10. सुधार आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य ————-की स्थापना होती है।
  11. सामाजिक आन्दोलन की गति एवं विकास अनेक —————पर निर्भर करता है।
  12. भारतीय समाज का उच्च वर्ग आज भी ————-को ऊँचा उठाकर समानता के स्तर पर लाने को तैयार नहीं है।
  13. ———– नक्सलवाद प्रभावित राज्य है।
  14. व्यक्ति की स्वतन्त्रता को———- बाधित करती है।
  15. विकास के क्षेत्र में अन्तर जब एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है तब उसे————- स्थिति कहा जाता है।
  16. महिला सशक्तिकरण हेतु सरकार द्वारा महिलाओं को वित्तीय सहायता देने हेतु राष्ट्रीय की ———-स्थापना की है।
  17. समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने तथा महिलाओं के विकास हेतु राष्ट्रीय का———– गठन किया गया है।
  18. ————हेतु संसद एवं राज्य विधान सभाओं में स्थान आरक्षित करने के अलावा उनमें जागरूकता होना जरूरी है।
  19. 73वें एवं 74वें——– संस्थाओं में संवैधानिक संशोधनों द्वारा महिलाओं को पंचायती राज आरक्षण दिया गया है।

 

उत्तर- 1. स्वामी दयानन्द सरस्वती 2. श्री सैय्यद पोरूल हसन रिजवी, 3. व्यावहारिक न्यायालय, 4. आर्थिक, 5. 1955, 6. मातृवंशीय, 7. आदिवासी, 8. सामाजिक परिवर्तन, 9. सामाजिक, 10. प्रक्रिया, 11. आदर्श समाज, 12. कारकों, 13. हरिजनों, 14. आन्ध्र प्रदेश, 15. आर्थिक असमानता, 16. क्षेत्रीय असन्तुलन, 17. महिला कोष, 18. महिला आयोग, 19. महिला सशक्तिकरण, 20. एक-तिहाई ।

 

सत्य / असत्य

    1. 8 मार्च महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है।
    2. जैविकीय दृष्टि से पुरुष और स्त्री असमान है।
    3. सन् 1955 में हिन्दू विवाह अधिनियम पारित हुआ।
    4. भारत में अल्पसंख्यकों को मुख्यतः 5 श्रेणियों में बाँटा गया है।
    5. भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों में मुसलमानों के बाद ईसाइयों का स्थान है।
    6. भारत में महिला समृद्धि योजना सन् 1995 से प्रारम्भ की गई।
    7. भारत के राजनैतिक और आर्थिक विकास में अल्पसंख्यकों की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है।
    8. फखरुद्दीन अली अहमद भारत के राष्ट्रपति थे।
    9. 19वीं शताब्दी के जाति प्रथा एवं सती प्रथा के विरुद्ध चले आन्दोलन सामाजिक आन्दोलन की श्रेणी में आते हैं।
    10. सामाजिक आन्दोलन पुरानी तथा नई दोनों प्रकार की समस्याएँ उठा सकते हैं।
    11. सामाजिक आन्दोलन समाज से जुड़े मामलों अथवा समस्याओं को उठाते हैं। 12. अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के उम्मीदवारों हेतु कोई भी प्रशिक्षण योजना नहीं चल रही है।
    12. 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित जातियों की संख्या 26-49% है।
    13. भारत में कामकाजी महिलाओं के जीवन की मुख्य समस्या उनकी विभिन्न भूमिका है।
    14. बंचित समूह सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर होते हैं इसलिए इन्हें दुर्बल वर्ग कहते हैं।
    15. अस्पृश्यता जिसे आम बोलचाल की भाषा में छुआछूत कहा जाता है।
    16. अक्षम व्यक्ति को हमेशा शिकार यानि पीड़ित व्यक्ति के रूप में देखा जाता है।
    17. भारत में निर्योग्य, बाधित, अक्षम, अपंग, अन्धा और बहरा का प्रयोग एक ही भाव को दर्शाने के लिए किया जाता है।
    18. ज्योतिबा फुले ने सती प्रथा विरोधी अभियान चलाया।
    19. महादेव गोविन्द रानाडे ने विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए आन्दोलन चलाया।

 

उत्तर- 1. सत्य, 2. असत्य, 3. सत्य, 4. असत्य, 5. सत्य, 6. सत्य, 7. असत्य, 8. सत्य, 9. सत्य, 10. सत्य, 11. सत्य, 12. असत्य, 13. असत्य, 14. सत्य, 15. सत्य, 16. सत्य, 17. सत्य, 18. सत्य, 19. असत्य, 20. सत्य

 

जोड़ी मिलाइए

I. 

 

        1. भारत के अल्पसंख्यक वर्ग के प्रथम राष्ट्रपति                                    (i) 1979
        2. दहेज निरोधक अधिनियम                                                               (ii) 2 अक्टूबर, 1993
        3. नगालैण्ड, मणिपुर में बहुसंख्यक हैं                                                 (iii) डॉ. जाकिर हुसैन
        4. समान वेतन अधिनियम                                                                   (iv) श्री रामनाथ कोविंद
        5. महिला समृद्धि योजना                                                                     (v) ईसाई
        6. भारत के राष्ट्रपति                                                                            (vi) 1961

 

 

उत्तर-1. → (iii), 2. → (vi), 3.→ (v), 4. → (i). 5. → (ii), 6. → (iv)

 

II.

        1. सामाजिक सुधार आन्दोलन                                                  (i) प्रतिरोध आन्दोलन
        2. दलितों को न्याय दिलाना                                                      (ii) 3743
        3. आदिवासी संस्कृति का विनाश                                             (iii) बिहार के पूर्व मुख्यमन्त्री
        4. सामाजिक संगठन की सुदृढ़ता                                              (iv) नई सामाजिक समस्या
        5. वी.पी. मण्डल                                                                       (vi) 19वीं शताब्दी
        6. मण्डल आयोग द्वारा घोषित पिछड़ी जातियाँ                           (v) प्राचीन सामाजिक समस्या

 

उत्तर- 1. (vi), 2. (v), 3. (iv), 4. (1), 5.- → (ii) 6. (iii)

 

III.

 

        1. जनजातियों का प्रजातीय वर्गीकरण                                                       (i) समाज कल्याण मन्त्रालय एवं स्थायी संसदीय समिति
        2. काका कालेलकर                                                                                (ii) 25 जनवरी, 2010
        3. अपनी ही जाति में किया गया विवाह                                                     (iii) दुर्गम क्षेत्र
        4. अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों का                                                  (iv) अन्तर्विवाह विकास
        5. अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों हेतु                                                  (v) डॉ. बी. एस. गुरु आरक्षण
        6. सम्पूर्ण जनजातियों तक शासकीय नीतियों                                            (vi) प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग की पहुँच नहीं

 

उत्तर- -1.→ (V), 2. → (vi), 3.→ (iv), 4. →→ (1), 5.→ (ii), 6.→ (mm)!

एक शब्द / वाक्य में उत्तर

    1. सवर्णों तथा हरिजनों के बीच परस्पर ईर्ष्या एवं द्वेष का क्या कारण है?
    2. अनुसूचित जातियों के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति कौन करता है ?
    3. सन् 1935 में सरकार ने किन जातियों को अनुसूचित जातियों का नाम दिया ?
    4. अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने सम्बन्धी फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने किस वर्ष किया ?
    5. स्वतन्त्रता के बाद राज्यों के पुनर्गठन से किसे बढ़ावा मिला ?
    6. क्षेत्रीय असुन्तलन की कोई एक स्थिति लिखिए।
    7. समाज में जातिवाद तथा ऊँच-नीच की भावना का उदय किस आधार पर हुआ है ?
    8. जिन आन्दोलनों का उद्देश्य महिलाओं हेतु व्यक्ति, पारिवारिक एवं सार्वजनिक जीवन में समानता दिलाना होता है, वे क्या कहलाते हैं ?
    9. घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम किससे सम्बन्धित है?
    10. अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस किस दिन मनाया जाता है ?
    11. भारत में महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में क्या कार्य हुआ है?
    12. देह व्यापार पीड़िता महिलाओं को राहत, बचाव तथा पुनर्वास हेतु किस योजना को शुरूआत की गई है?
    13. किसी महिला को कण्णगी पुरस्कार कब दिया जाता है ?
    14. उन्नीसवीं सदी में किसने बंगाल में समाज सुधार आन्दोलन शुरू किया ?
    15. नगालैण्ड, मेघालय और मणिपुर राज्य में किस धर्म के लोग अधिक रहते हैं ?

 

उत्तर- 1. अस्पृश्यता, 2. राष्ट्रपति, 3. दलित जातियों को, 4. 1992 में, 5. क्षेत्रवाद, 6. गाँव एवं शहर के बीच विकास एवं जनसुविधाओं का अन्तर 7. सामाजिक असमानता, 8. महिला आन्दोलन, 9. महिलाओं की सुरक्षा से 10. प्रतिवर्ष 8 मार्च को, 11. सामूहिक ऋण योजनाएँ, छोटे उद्योगों का विकास, बेहतर वेतन आदि कार्य हुए हैं, 12. उज्ज्वला योजना, 13. जब किसी महिला ने व्यथित महिलाओं के उत्थान हेतु कोई उल्लेखनीय कार्य किया हो, 14. राजा राममोहन राय ने, 15. ईसाई धर्म ।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. सामाजिक संसाधन किसे कहते हैं?

उत्तर – सामाजिक संसाधन (पूँजी) तीन रूपों में विभाजित है-

(1) आर्थिक पूंजी भौतिक सम्पत्ति एवं आय के रूप में।

(2) सांस्कृतिक पूँजी प्रतिष्ठा और शैक्षणिक योग्यता के रूप में।

(3) सामाजिक पूँजी सामाजिक संगतियों एवं सम्पर्कों के जाल के रूप में।

 प्रश्न 2. अस्पृश्यता का शाब्दिक अर्थ है?

उत्तर-अस्पृश्यता का शाब्दिक अर्थ है-न छूना। इसे सामान्य भाषा में छुआ-छूत की समस्या भी कहते हैं।

प्रश्न 3. सामाजिक स्तरीकरण क्या है?

उत्तर-सामाजिक स्तरीकरण-समाज के विभिन्न वर्गों की उनके स्तर के अनुरूप अधिकृमित व्यवस्था है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का वर्ग निश्चित होता है, सामाजिक स्तरीकरण कहलाता है।।

प्रश्न 4. जनजाति किसे कहते हैं?

उत्तर- जनजाति ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जो दूर जंगलों या पहाड़ों में आदिम या पुरातन अवस्था में रहता है जिसकी अपनी संस्कृति और रीति-रिवाज होते हैं।

प्रश्न 5. वंचित समूह किसे कहते हैं?

उत्तर- भारतीय समाज का ऐसा समूह जिसको सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक अधिकार प्राप्त नहीं हुए थे, उस समूह को वंचित समूह कहते हैं क्योंकि ये अधिकार न मिलने के कारण वह विकास से वंचित रह गए।

प्रश्न 6. पिछड़ा वर्ग किसे कहते हैं?

उत्तर – यह सामान्य वर्ग में ही सम्मिलित होता है पर इसमें आने वाली जातियाँ गरीबी और शिक्षा के रूप में पिछड़ी होती है। यह भारत सरकार द्वारा प्रयुक्त एक सामूहिक शब्द है।

प्रश्न 7. अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयोग का मुख्य कार्य क्या

 उत्तर—अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति आयोग का मुख्य कार्य इन जातियों है?के कल्याण हेतु सरकार को परामर्श देना है।

प्रश्न 8. अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों में कार्यरत् किन्ही शासकीय संस्थाओं के नाम लिखिए।

उत्तर- (1) समाज कल्याण मन्त्रालय, (2) स्थायी संसदीय समिति ।

प्रश्न 9. सती प्रथा के खिलाफ सामाजिक आन्दोलन किसके द्वारा चलाया गया था?

उत्तर- सती प्रथा के खिलाफ सामाजिक आन्दोलन राजा राममोहन राय ने चलाया।

प्रश्न 10. सामाजिक आन्दोलन से आप क्या समझते हैं?

उत्तर    आन्दोलन किसी भी संगठन द्वारा मुख्य समस्याओं हेतु चलाए जाते हैं, वे सामाजिक आन्दोलन कहलाते हैं।

प्रश्न 11. पूर्वाग्रह का क्या अर्थ है ?

उत्तर- एक समूह के सदस्यों द्वारा, दूसरे समूह के बारे में जो पूर्वकल्पित विचार या व्यवहार होता है उसे पूर्वाग्रह कहते हैं।

प्रश्न 12. धार्मिक निर्योग्यता क्या है?

उत्तर  -निम्न जातियों के मन्दिरों में जाने, धार्मिक ग्रन्थ पढ़ने, धार्मिक अनुष्ठान करने उत्तर- पर रोक थी ये कुरीतियाँ ही धार्मिक निर्योग्यता कहलाती है।

प्रश्न 13. विभेदीकरण क्या है?

उत्तर– आयु, लिंग, जाति, बुद्धि, व्यक्तित्व, सम्पत्ति, धर्म आदि के आधार पर समाज को अनेक प्रकार के समूहों में विभाजित करने की व्यवस्था को ही विभेदीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 14. अनुसूचित जातियाँ किसे कहते हैं?

उत्तर- जाति प्रथा के अन्तर्गत चार प्रमुख जातियों के अलावा एक पाँचवाँ वर्ग भी है जिसके सदस्यों को परम्परागत रूप से अस्पृश्य कहा जाता था। सरकार ने कुछ विशेष सुविधाएँ व संरक्षण देने के उद्देश्य से एक सूची के अन्तर्गत रखते हुए अनुसूचित जाति का नाम दिया, उन्हें ही अनुसूचित जातियों कहा जाता है।

प्रश्न 15. लैंगिक विभेद किसे कहते हैं?

उत्तर- जैविकीय या शारीरिक दृष्टिकोण से ले सम्पूर्ण मानव जाति और पुरुष के बीच अन्तर देखने को मिलता है लेकिन भारतीय समाज में लिंग के आधार पर स्त्री एवं पुरुष में जो भेदभाव किया जाता है, उसे लैंगिक विभेद कहते हैं।

प्रश्न 16. अंग्रेजों के समय स्त्रियों के लिए कौन-कौन से कानून बनाए गए ?

उत्तर- सती प्रथा निषेध कानून, हिन्दू-विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, बाल विवाह अवरोध अधिनियम, मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम इत्यादि कानून अंग्रेजों के समय में बनाए गए।

प्रश्न 17. सती प्रथा निषेध अधिनियम क्या है?

उत्तर- सती प्रथा (पाशविक प्रथा) के विरुद्ध राजा राममोहन राय ने एक आन्दोलन चलाया, इसके परिणामस्वरूप तत्कालीन सरकार द्वारा 1829 में सती प्रथा निषेध अधिनियम पारित किया गया। आज यह प्रथा पूर्णतः समाप्त हो गई है।

प्रश्न 18. स्वतन्त्र भारत में महिलाओं के लिए बने कानून क्या-क्या हैं?

उत्तर- हिन्दू विवाह वैधानीकरण अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम, हिन्दू विवाह तथा विवाह विच्छेद अधिनियम, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, महिला आरक्षण, घरेलू हिंसा में महिलाओं की सुरक्षा इत्यादि कानून हैं।

प्रश्न 19. अक्षमता से आप क्या समझते हैं?

उत्तर– समाज के वह नागरिक जो किसी बीमारी, विकलांगता अथवा बेसहारा होने के कारण स्थायी/अस्थायी रूप से कार्य करने में अक्षम होते हैं, उनकी इस प्रकार की स्थिति को अक्षमता कहते हैं।

प्रश्न 20. निर्धनता का अक्षमता से क्या सम्बन्ध है?

उत्तर- अक्षमता और निर्धनता के बीच एक अटूट सम्बन्ध होता है। कुपोषण, बार-बार बच्चे पैदा करने से कमजोर हुई माताएँ, रोग-प्रतिरक्षा के अपर्याप्त कार्यक्रम, भीड़-भाड़ भरे प में दुर्घटनाएँ, ये सब बातें एक साथ मिलकर गरीब लोगों में अक्षमता की स्थिति ला देती हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. सामाजिक विषमता क्या है?

उत्तर- सामाजिक संसाधनों के असमान वितरण को सामाजिक विषमता कहते हैं। ये प्राकृतिक नहीं होते वरन् यह समाज द्वारा उत्पन्न व्यवस्था है। समाज के उच्च वर्ग के पास पैसा, सम्पत्ति, शिक्षा, ज्ञान, स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ होता है जबकि निम्न वर्ग के पास कुछ भी नहीं होता। वह उच्च वर्ग के अत्याचारों का शिकार हो जाता है। यही भिन्नता एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती रहती है और चरम पर पहुँच जाती है। सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच की पद्धति ही साधारणतया सामाजिक विषमता कहलाती है। कुछ सामाजिक विषमताएँ व्यक्तियों के बीच स्वाभाविक भिन्नता को प्रतिबिम्बित करती हैं। उदाहरणस्वरूप उनकी योग्यता एवं प्रयास में भिन्नता। कोई व्यक्ति असाधारण बुद्धिमान या प्रतिभावान हो सकता है या यह भी हो सकता है कि उसने समृद्धि और अच्छी स्थिति पाने के लिए कठोर परिश्रम किया हो तथापि सामाजिक विषमता व्यक्तियों के बीच सहज या प्राकृतिक भिन्नता की वजह से नहीं बल्कि यह उस समाज द्वारा उत्पन्न की जाती है जिसमें वे रहते हैं।

 

प्रश्न 2. पूर्वाग्रह क्या है?

उत्तर-पूर्वाग्रह का अर्थ पूर्व निर्णय है, अर्थात् किसी मामले में तथ्यों की जाँच किए बिना ही राय बना लेना या मन में निर्णय ले लेना। इस शब्द का उस स्थिति में प्रयोग किया जाता है जब किसी व्यक्ति या लोगों के किसी समूह के विरुद्ध निर्णय दिया गया हो और वह व्यक्ति या लोग किसी विशेष लिंग, राजनैतिक विचार, वर्ग, उम्र, धर्म, जाति, भाषा, राष्ट्रीयता के हों पूर्वाग्रह ज्यादातर एक समूह के बारे में अपरिवर्तनीय कठोर और रूढ़िबद्ध धारणाओं पर आधारित हैं। रूढ़िबद्ध धारणाएँ ज्यादातर नृजातीय और प्रजातीय समूहों और महिलाओं के बारे में प्रयोग की जाती हैं। भारत जैसे देश में जो बहुत समय तक एक उपनिवेश रहा है, कई रूढ़िबद्ध विचार औपनिवेशिक देन हैं। कुछ समुदायों को ‘वीर प्रजाति’ की संज्ञा दी जाती है तो कुछ को कायर ।

 

प्रश्न 3. सामाजिक बहिष्कार अपवर्जन किसे कहते हैं?

उत्तर-   सामाजिक बहिष्कार वह तौर-तरीके हैं जिनके जरिए किसी व्यक्ति वा समूह को समाज में पूरी तरह घुलने-मिलने से रोका जाता है व अलग या पृथक् रखा जाता है। वह उन सभी कारकों पर ध्यान दिलाता है जो व्यक्ति या समूह को उन अवसरों से वंचित करते हैं। जो अधिकांश जनसंख्या के लिए खुले होते हैं। भरपूर तथा क्रियाशील जीवन जीने के लिए व्यक्ति को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (जैसे-रोटी, कपड़ा तथा मकान) के अलावा अन्य आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं (जैसे-शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात के साधन, बीमा, सामाजिक सुरक्षा, बैंक तथा यहाँ तक कि पुलिस एवं न्यायपालिका) की भी जरूरत होती है। सामाजिक भेदभाव आकस्मिक या अनायास रूप से नहीं बल्कि व्यवस्थित तरीक से होता है। यह समाज की संरचनात्मक विशेषताओं का परिणाम है।

 

प्रश्न 4. सामाजिक स्तरीकरण के क्या उद्देश्य हैं?

उत्तर-स्तरीकरण सामाजिक विभाजन की वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा विभिन्न श्रेणियों के लोगों को एक-दूसरे से अलग अधिकार, शक्तियाँ, सम्मान, साधन और पुरस्कार दिए जाते हैं।

  • इस प्रक्रिया में विभिन्न श्रेणियों और समूहों का इस तरह निर्माण होता है, जिससे उन्हें एक-दूसरे से भिन्न साधन और शक्तियाँ मिल सकें।
  • विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच पाई जाने वाली असमानता की तुलना धरती की सतह में चट्टानों की परतों से या एक पौढ़ी के ऊपरी और निचले हिस्सों से की जा सकती है।
  • किसी समाज की विभिन्न प्रस्थिति वाले समूहों के अधिकारों, सम्मान और सुविधाओं के अनुसार उनके बीच उच्चता और निम्नता का जो विभाजन होता है उसी को हम सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं।

 

प्रश्न 5. विभेदन क्या है?

उत्तर- किसी व्यक्ति या अन्य चीज के पक्ष में या उसके विरुद्ध उसके व्यक्तिगत गुण-अवगुणों को न देखते हुए, उसके किसी वर्ग, श्रेणी या समूह का सदस्य होने के आधार पर भेद करने की प्रक्रिया विभेद कहलाती है विभेद में स्थानों, अधिकारों और अन्य चीजों से वंचित कर दिया जाता है। भेदभावी परम्पराएँ नीतियों, विचार, कानून और रीतियाँ बहुत से समाज, देशों और संस्थाओं में हैं और अक्सर यह वहाँ भी मिलती है जहाँ औपचारिक रूप से भेदभाव को न्यायिक रूप से अनौचित्य समझा जाता है। यह किसी धर्म, जाति, मूलवंश के प्रति किया गया नकारात्मक व्यवहार है।

 

प्रश्न 6. जनजातियों को कौन-सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

उत्तर- जनजातीय लोग दूर घने जंगलों, पहाड़ों में रहते हैं, जहाँ साधनों के अभाव मैं यह विकास नहीं कर पाते। जनजातीयों की आर्थिक स्थिति मजबूत न होने के कारण इन्हें साहूकार व महाजनों से ऊँची ब्याज पर कर्जा लेना पड़ता है, जिससे यह और भी गरीब होते चले जाते हैं। उद्योगों में भी उद्योग मालिकों द्वारा इनकी मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें कम मूल्य पर रखा जाता है, निम्न मजदूरी दी जाती है। सरकारी अफसरों द्वारा भी इनको शोषित किया जाता है। अफसर इनके अंदरूनी मामलों में दखलदांजी देते हैं। इस वजह से भी इन लोगों के साथ समन्वय करने की समस्या आ रही है।

 

प्रश्न 7. जनजातियों के शैक्षिक उत्थान हेतु सरकारी प्रयास बताइए ।

उत्तर- जनजातियों के बच्चों को शिक्षा लेने के लिए निम्नलिखित तरीकों से प्रोत्साहित किया जा रहा है-

(1) निःशुल्क पाठ्य-पुस्तक वितरण किया जा रहा है।

(2) जनजातीय क्षेत्रों में विद्यालय खोले जा रहे हैं।

(3) पढ़ने के लिए फीस माफ और कई छात्रवृत्तियाँ भी दी जा रही हैं।

(4) इनके क्षेत्रों में क्षेत्रीय कॉलेजों में रोजगार सम्बन्धी शिक्षा प्रदान की जा रही है। ताकि ये अपने लघु उद्योग खोल सकें।

प्रश्न 8. राजा राममोहन राय ने सामाजिक सुधार में क्या योगदान किया?

उत्तर- समाज के बुरे रीति-रिवाजों और कुप्रथाओं से समाज गर्त में जा रहा था। राय परम्परागत हिन्दू प्रथाओं के खिलाफ थे। उन्होंने सती प्रथा, बहुपत्नी, जाति कठोरता और बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि ‘सती प्रथा’ को बन्द करवाना था। यह एक ऐसी प्रथा थी जिसमें एक विधवा को अपने मृत पति के अन्तिम सरकार में खुद के शरीर को भी पति के साथ चिता पर बैठकर नष्ट करना पड़ता था । कानूनी रूप से इस प्रथा पर रोक लगाने के प्रसंग में उनको वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा।

 

प्रश्न 9. दलितों की समस्याओं के हल हेतु कुछ सुझाव दीजिए।

उत्तर – दलितों की विभिन्न समस्याओं के हल हेतु सुझाव-

(1) जाति प्रथा के संरचनात्मक स्वरूप के दोषों को समाप्त किया जाए।

(2) शिक्षा का प्रसार किया जाए।

(3) जाति प्रथा से व्यवसाय की बाध्यता को समाप्त किया जाए।

(4) उच्च जातियों में शारीरिक श्रम के प्रति सम्मान की भावना उत्पन्न की जाए।

(5) दलितों को अंध-विश्वास और नशाखोरी से मुक्त कराने के लिए स्वस्थ मनोरंजन की समुचित व्यवस्था की जाए।

प्रश्न 10. भारतीय समाज में स्त्रियों की निम्न दशा के क्या कारण हैं?

उत्तर- भारतीय समाज पुरुष प्रधान समाज है, स्त्रियाँ पुरुषों के अधीन रहती हैं। औरतों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता है। समाज में आए दिन बलात्कार, दहेज प्रथा एवं लिंग अनुपात सम्बन्धित अपराध, पत्नी का शारीरिक उत्पीड़न, कन्या भ्रूण हत्या जैसी हिंसक घटनाएँ होती हैं। औरतों को पुरुषों पर आर्थिक रूप से निर्भर रहना पड़ता है। शिक्ष का अभाव होने के कारण उन्हें अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं होता है। अज्ञानता के कारण अनेक अंधविश्वासों, कुरीतियों के बीच अकड़ी रहती है। स्त्रियों को चारदीवारी के अन्दर रखकर पति को परमेश्वर मानने का उपदेश उसे बचपन से ही पढ़ाया जाता है तथा पूरा जीवन सबके बीच में रहते हुए, सबकी सेवा करते हुए बिता देना स्त्री का धर्म समझा जाता रहा है।

 

प्रश्न 11. शिक्षा ने महिलाओं के हालात सुधारने में कैसे मदद की?

उत्तर – शिक्षा प्रत्येक मानव को उन्नति का मार्ग है। शिक्षा के कारण महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार आया है। औरतों में अपने अधिकारों के प्रति जागृति आई है। शिक्षा के कारण वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुई। महिलाओं की सुरक्षा हेतु कई कानून बनाए गए। शिक्षा प्राप्त करने की वजह से अब महिलाएँ राजनीतिक क्षेत्रों में भी काफी आगे आ रही हैं। ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों में योग्यता प्राप्त करके आगे बढ़ रही है। उनमें समानता और स्वतन्त्रता के आदर्श विकसित हुए हैं। के. एस. कपाड़िया लिखते हैं कि “स्त्रियों को उच्च शिक्षा ने हिन्दू विवाह और परिवारों के आदर्शों तथा रिवाजों को गम्भीर रूप से प्रभावित किया है।” जिन स्त्रियों की मानसिक रूप से पुरुषों से निम्न कहा जाता था, वे आज प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों से आगे बढ़ रही है। अतः शिक्षा का महिलाओं को प्रगति में सबसे बड़ा हाथ है।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

प्रश्न 1. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति हेतु राष्ट्रीय आयोग के गठन पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए संविधान के 65वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1990 द्वारा एक राष्ट्रीय आयोग की व्यवस्था की गई है। इस राष्ट्रीय आयोग का गठन 12 मार्च, 1992 को किया गया था।

आयोग का स्तर इस राष्ट्रीय आयोग को संवैधानिक स्तर प्राप्त है। इस आयोग को एक व्यवहारिक न्यायालय के सभी अधिकार प्रदान किए गए हैं। आयोग की संरचना-85वें संवैधानिक संशोधन, 2003 के आधार पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के स्थान पर अलग-अलग आयोगों की स्थापना करने हेतु उनकी संरचना के बारे में निम्नलिखित प्रावधान है-

(1) अनुसूचित जातियों हेतु राष्ट्रीय आयोग में एक अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य होते हैं।

(2) अनुसूचित जनजातियों हेतु राष्ट्रीय आयोग में एक अध्यक्ष एवं दो अन्य सदस्य होते हैं। उक्त सभी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

प्रश्न 2. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के कार्य क्या है?

उत्तर- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के निम्नलिखित कार्य है-

(1) अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों एवं उन्हें प्रदत्त सुविधाओं के उल्लघन से सम्बन्धित शिकायतों की जाँच करना।

(2) संविधान तथा अन्य किसी विधि के द्वारा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों को दी जाने वाली सुविधाओं की जाँच करना।

(3) अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास के नियोजन की प्रक्रिया में भाग लेना। उसके सम्बन्ध में परामर्श देना एवं संघ एवं राज्यों में उसके विकास का मूल्यांकन करना।

(4) अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा, उनके कल्याण तथा विकास एवं उन्नति के सम्बन्ध में ऐसे अन्य कार्य करना।

 

प्रश्न 3. सामाजिक स्तरीकरण का अर्थ एवं परिभाषा बताते हुए सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख आधार स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-संसार की सभी संस्कृतियों के अध्ययन से पता चलता है कि किसी भी समाज में व्यक्तियों को समान स्थिति व पद प्राप्त नहीं होते। सभी समाजों में जनसंख्या अनेक सामाजिक समूहों में विभक्त होती है। आदिम समाजों में आयु, लिंग, मुखिया आदि के आधार पर समाज में समूहों का विभाजन था। इसी विभाजन के आधार पर समाज में ऊँच-नीच का भेद होता था। समाज के अन्तर्गत विभिन्न समूहों के कुछ स्तरों में विभाजित हो जाने की प्रक्रिया को ही सामाजिक स्तरीकरण कहा जाता है।

सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा-स्तरीकरण समाज की वह व्यवस्था है जिसके आधार पर समाज में विभिन्न व्यक्तियों को उच्च तथा निम्न पद की शक्ति प्राप्त होती है। श्री रेमण्ड मुरे के अनुसार स्तरीकरण समाज का उच्च तथा निम्न सामाजिक इकाइयों में किया गया समतल विभाजन है। सामाजिक स्तरीकरण के आधार

(1) आर्थिक आधार-समाज में सदा ही दो वर्ग होते हैं- एक तो वह वर्ग जिसका कि सम्पत्ति, पूँजी या उत्पादन के साधनों पर अधिकार होता है और दूसरा वर्ग जो कि सर्वहारा होता है। अर्थात् जिसका सम्पत्ति, पूँजी और उत्पादन के साधनों पर अधिकार नहीं होता है, वह केवल अपना श्रम बेचकर अपना पेट पालता है। पहले वर्ग की स्थिति, सम्पत्ति पर अधिकार होने के कारण समाज में ऊँची होती है। जबकि दूसरे वर्ग की स्थिति निम्न होती है और इसलिए उसे उच्च वर्ग के आर्थिक शोषण का शिकार बनना पड़ता है।

(2) राजनीतिक आधार-राजनीतिक सत्ता के आधार पर भी ऊँच-नीच का स्तरीकरण देखने को मिलता है। राजा और प्रजा, शासक और शासित में जो ऊँच-नीच का स्तरीकरण होता है, वह राजनीतिक स्तरीकरण कहलाता है।

(3) धार्मिक आधार- जन्म और व्यवसाय की बदौलत ब्राह्मणों को सबसे उच्च स्थिति और दलितों को निम्न स्थिति दी गई है।

 

प्रश्न 4. अनुसूचित जातियों की सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर– अनुसूचित जातियों की सामाजिक तथा आर्थिक समस्याएँ निम्नवत है-

(1) सामाजिक सम्पर्क पर प्रतिबन्ध – अनुसूचित जातियों को समाज के अन्य वर्गों के साथ अन्तर्क्रिया करने पर भी प्रतिबन्ध थे। उन्हें उच्च जातियों के सामने सिर नीचा करके चलने के आदेश दिए जाते थे।

(2) सार्वजनिक स्थलों में उपयोग पर रोक- समाज में सार्वजनिक कुओं, नदी, तालाबों, यहाँ तक कि मन्दिरों में भी जाने पर प्रतिबन्ध थे। अगर वे ऐसा करते थे तो उन्हें दण्डित किया जाता था।

(3) छुआछूत – अनुसूचित जातियों को अछूत जाति समझकर छू लेना भी पाप समझते थे और छू जाने पर गंगाजल आदि से नहा कर ही शुद्ध मानते थे। उनकी परछाई से भी दूर रहा जाता था।

(4) आवासीय निर्योग्यताएँ – अनुसूचित जातियों के लोग अन्य जातियों के लोगों की तरह गाँव में न रहकर दूर जंगलों के पास निवास करते थे। गाँव से बाहर रहकर ही वह अन्य जातियों से अलग-अलग रहा करते थे।

(5) विवाह सम्बन्धी प्रतिबन्ध अनुसूचित जाति के सदस्य अपने से उच्च जाति के – साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकते थे क्योंकि जाति अन्तर्विवाही होती थी।

(6) शैक्षणिक निर्योग्यताएं अनुसूचित जातियों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। यदि कोई किसी शिक्षण संस्थान में प्रवेश पा भी जाता था तो उसके साथ अच्य व्यवहार नहीं किया जाता था।

(7) निम्न सामाजिक स्थिति अनुसूचित जातियों की सामाजिक संस्तरण में निम्न स्थिति थी। इसके अलावा अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक निर्योग्यताएँ थीं, जिनकी वजह से उनके अन्दर हीन भावना घर कर गई थी।

 

प्रश्न 5. अस्पृश्यता अधिनियम, 1955 तथा नागरिक अधिकार संरक्षण कानून, 1976 पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर-अस्पृश्यता अधिनियम, 1955- अस्पृश्यता को समाप्त करने तथा अस्पृश्यों पर विभिन्न निर्योग्यताओं को समाप्त करने हेतु अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955, पारित कर सम्पूर्ण देश में लागू किया गया। इस अधिनियम की 17 धाराओं के द्वारा सभी प्रकार की निर्योग्यताओं को समाप्त किया जा चुका है। इस कानून के अनुसार हरिजन (अछूतों को सार्वजनिक स्थलों पर जाने, धार्मिक कर्मकाण्डों व धार्मिक संस्थाओं में प्रवेश करने तथा उनको गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार दिया गया है। इस कानून की अवहेलना करने वालों को 6 माह की कैद तथा ₹500 तक का जुर्माना हो सकता है। नागरिक अधिकार संरक्षण कानून, 1976- नागरिक अधिकार संरक्षण कानून, 1976 में यह प्रावधान किया गया है कि अस्पृश्यता अपराध में दण्डित लोग लोकसभा तथा विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। पुलिस अस्पृश्यता से सम्बन्धित अपराध में अपराधी पर बिना किसी शिकायत के सीधी कार्यवाही कर सकते हैं।

 

प्रश्न 6. पिछड़े वर्गों की प्रमुख समस्याएँ बताइए।

उत्तर-पिछड़े वर्गों की प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित है-

(1) पिछड़े वर्गों में शिक्षा का अभाव होने के कारण शासकीय सेवा में और विशेष रूप से उच्च पदों पर इन वर्गों के लोगों की संख्या न्यूनतम है। अधिकतर पिछड़े वर्ग के लोग अभी भी अपने परम्परागत व्यवसायों में लगे हुए हैं। अतः आधुनिक उद्योगों एवं व्यवसायों में इनका प्रतिनिधित्व कम है।

(2) निर्धनता की दर पिछड़े वर्गों में अधिक है। कृषि योग्य भूमि पर इनका स्वामित्व उच्च वर्गों की तुलना में बहुत कम है। अभी तक इस वर्ग के लोग जजमानी प्रथा के तहत उच्च जातियों को सेवाएँ प्रदान करते थे और इसके बदले प्राप्त पारिश्रमिक भी बहुत कम था। अतः इनका जीवन-स्तर ऊँचा नहीं उठ पाया है।

(3) अशिक्षा एवं जागरूकता की कमी के कारण इन्हें संख्या के अनुपात में समुचित राजनीतिक भागीदारी भी प्राप्त नहीं हो सकी है। यद्यपि अब यह स्थिति बदल रही है किन्तु आज भी सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक समस्याएँ विद्यमान हैं।

(4) भारत के विभिन्न राज्यों में अन्य पिछड़े वर्गों की पहचान करना एक बड़ी समस्या है। भारत में स्वतन्त्रता के बाद अभी तक जातियों के आधार पर कोई जनगणना नहीं की गई। इस दशा में यह जानना बहुत अधिक कठिन है कि देश में अन्य पिछड़े वर्गों की वास्तविक जनसंख्या कितनी है तथा कौन-सी जाति सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक क्षेत्र में कितन पिछड़ी है।

 

प्रश्न 7. पिछड़े वर्गों के विकास हेतु सरकार द्वारा किए गए प्रयत्नों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- पिछड़े वर्गों के विकास हेतु सरकार ने निम्नलिखित प्रयत्न किए हैं-

(1) राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना सरकार द्वारा सन् 1992 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना की गई इस आयोग का मुख्य उद्देश्य पिछड़े वर्ग की सूची में किस जाति को शामिल करने या सूची से किस जाति को हटाने से सम्बन्धित सलाह सरकार को देना है।

(2) राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग और विकास निगम की स्थापना गरीबी की रेखा से नीचे के अन्य पिछड़े वर्गों को रियायती दर पर ऋण देने और उन्हें आर्थिक सुविधा पहुँचाने हेतु राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त और विकास निगम की स्थापना की गई।

(3) स्वर्णिम योजना का आरम्भ गरीबी की रेखा से नीचे की स्त्रियों के लिए एक नई योजना आरम्भ की गई जिसका नाम स्वर्णिम योजना है। इस स्वर्णिम योजना के अन्तर्गत पिछड़े वर्ग की गरीब स्त्रियों को चार प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर पर ₹ 50 हजार तक का ऋण दिया जाता है।

(4) सरकार द्वारा छात्रवृत्तियाँ प्रदान करना-

(अ) मैट्रिक पूर्व छात्रवृत्ति – अन्य पिछड़े वर्गों में जिन लोगों की वार्षिक आय ₹ 44,500 से अधिक नहीं है उनके बच्चों को 10वीं कक्षा से पूर्व किसी भी कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है।

(ब) मैट्रिक से ऊपर के बच्चों को छात्रवृत्ति – अन्य पिछड़े वर्गों के उन बच्चों को, जिनके माता-पिता की वार्षिक आय र44,500 से अधिक नहीं है, उनके बच्चों को जो दसवीं कक्षा के ऊपर शिक्षा प्राप्त रहे हैं, उन्हें भी छात्रवृत्ति दी जाती है।

 

प्रश्न 8. समाज में महिलाओं की निर्बल स्थिति के मुख्य कारण क्या हैं ? उल्लेख कीजिए।

उत्तर- समाज में महिलाओं की निर्बल स्थिति के निम्नलिखित कारण है-

(1) अशिक्षा भारत में काफी समय से नारी को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं रहा है। इस देश में शिक्षा केवल नौकरी के लिए ही आवश्यक समझी जाती है और चूँकि स्त्रियों के लिए नौकरी करना उचित नहीं समझा जाता। अतः उनके लिए शिक्षा की आवश्यकता नहीं समझी गई, परिणामस्वरूप स्त्रियों की अशिक्षा के कारण उनकी स्थिति समाज में गिर गई।

(2) बाल-विवाह-मध्यकाल से ही कन्याओं का विवाह अल्पकाल में ही होने लगा। वह घर में एक दासी के रूप में काम करने लगी। वह एक वस्तु बन गई क्योंकि उसका कन्यादान होने लगा।

(3) आर्थिक निर्योग्यताएँ स्त्रियों को न तो नौकरी करने का अधिकार था और न हो वे संघ बनाकर कोई कारोबार कर सकती थीं। 1937 से पहले स्त्रियों को सम्पत्ति के सम्बन्ध में कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं था।

(4) संयुक्त परिवार संयुक्त परिवार में स्त्रियों को कोई स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं थी। वे कहीं भी अपनी इच्छा से आ-जा नहीं सकती थीं। उनको कोई आर्थिक अधिकार प्राप्त नहीं थे। स्त्रियाँ संयुक्त परिवार में पुरुषों पर निर्भर रहती थीं।

(5) सामाजिक कुरीतियाँ- समाज की कुरीतियों ने समाज में स्त्रियों की स्थिति को दयनीय बना दिया। समाज में दहेज प्रथा के कारण कन्याओं को बोझ समझा जाता था। इसके अलावा कुलीन विवाह पर प्रतिबन्ध का भी स्त्रियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

(6) पारिवारिक निर्योग्यताएं-स्वियं अपने पारिवारिक जीवन के सम्बन्ध में अनेक निर्योग्यताओं का शिकार थीं। समाज में विधवाओं को असम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। पत्नी के रूप में उसकी स्थिति दयनीय थी। पुरुषों की दृष्टि में वे दासी थीं और पति उन्हें मारना पीटना तथा उनका अनादर करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था।

(7) मुसलमानों के आक्रमण – मुसलमानों के आक्रमणों के कारण स्त्रियों की दशा दयनीय हो गई। उनको घरों में बन्द रखा जाने लगा। पर्दा प्रथा का प्रारम्भ हुआ, बाल-विवाह किया जाने लगा इससे उनकी दशा और गिर गई।

 

प्रश्न 9. महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए-

(1) संवैधानिक प्रावधान- अनुच्छेद 14, 15, 16, 39D, 42, 51A (E), 243 के माध्यम से प्रावधान किए गए। अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के सामने सभी समान हैं। अनुच्छेद 15 (1) द्वारा धर्म, जाति, लिंग या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव की मनाही है।

अनुच्छेद 16-राज्य रोजगार तथा नियुक्ति के मामलों में सभी भारतीयों को समान अवसर प्रदान करें। अनुच्छेद 39D- पुरुषों तथा महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाए। अनुच्छेद 42- कार्य की न्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न करें तथा आजीविका के समान अवसर उपलब्ध करवाएँ। अनुच्छेद 51A (E)-स्त्रियों के गौरव का अपमान करने वाली प्रथाओं का त्याग किया जाए। अनुच्छेद 243 के अनुसार स्थानीय निकाय पंचायतों तथा नगरपालिकाओं में एक-तिहाई स्थानों को महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है

।(2) कानून महिलाओं के कल्याण के लिए और भी अनेक कानून बनाए गए हैं। समान वेतन अधिनियम, सती प्रथा अधिनियम हिन्दू विवाह अधिनि हिन्दू स्वियों का सम्पत्ति पर अधिकार, दहेज प्रतिबन्ध अधिनियम आदि प्रमुख है। इस अलावा अनेक प्रान्तों में महिला कल्याण को अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं जिनमें स्वी शक्ति प्रवास योजना, डॉ दुर्गाबाई देशमुख पुरस्कार योजना महिला उद्यमियों हेतु ऋण योज अशा योजना, आंगनबाड़ी योजना किशोरी शक्ति योजना आदि प्रमुख है।

(3) सुधार संस्थाओं की स्थापना महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक स्वी गृहों की स्थापना की गई। देश की असहाय महिलाओं के प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण संस् की स्थापना की गई।

(4) स्त्री शिक्षा की व्यवस्था स्वतन्त्रता के पश्चात् स्त्रियों की शिक्षा के लिए अनेक स्कूल-कॉलेजों की व्यवस्था की गई। स्त्रियों को निःशुल्क शिक्षा देने की व्यवस्था भी की गई है।

 

प्रश्न 10. शारीरिक अक्षमता पर एक निबन्ध लिखिए।

उत्तर- प्रत्येक वर्ष 3 दिसम्बर को विश्वभर में ‘अन्तर्राष्ट्रीय विकलांगता दिवस’ मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य है-शारीरिक अथवा मानसिक रूप से अशक्त लोगों को सोच को सकारात्मक कर एवं उनके साथ-साथ समाज के सभी वर्गों की भागीदारी व सह की प्रोत्साहन देकर उन्हें विकास की मुख्य धारा में लाना। वास्तव में मानव समाज सभ्यता के प्रारम्भिक चरण से ही विकलांगता से आ रहा है और

आज अब हम 21वीं सदी में पहुँच चुके हैं, तब भी विकलांगों की स्थिति में कुछ खास बदलाव नहीं हुए हैं। आज सभी देशों में विकलांगों को शिक्षा, रोजगार, यातायात आदि सुविधाओं तक अपनी पहुँच बनाने में समस्याएं झेलनी पड़ती है, जिसके कारण वे शैक्षिक, आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में अत्पन्न पिछड़ जाते हैं और अपना स्वास्थ्य भी खो देते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में विकलांगों की संख्या 268 करोड़ थी, जो कुल आबादी का 2-21% है। इस जनगणना में दृष्टिहीनता, बधिर, मूक, चलने-फिरने में अक्षम, मानसिक मन्दता, मानसिक बीमारी, अन्य कोई एवं बहुविकलांगता जैसे आठ प्रकारों में बाँटा गया था। वर्ष 1996 में विकलांगों के प्रति समाज के दायित्वों के निर्धारण हेतु विकलांग व्यक्ति अधिनियम (समान अवसर अधिकारों का संरक्षण एवं पूर्ण सहभागिता) पारित किया गया जिसे वर्ष 1996 में लागू कर दिया गया। इस अधिनियम का उद्देश्य विकलांगों के प्रति किए जाने वाले भेदभाव को समाप्त कर उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ना था। इसके अन्तर्गत वर्ग(ग) एवं (घ) पदों की नियुक्ति में 3% आरक्षण को स्वीकृति प्रदान की गई।

  • इस अधिनियम में 18 वर्ष से कम आयु के विकलांग बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा देने की व्यवस्था की गई कही गई।
  • इस अधिनियम में विकलांगता को रोकने वाली प्रक्रियाओं को प्रोत्साहन देने की बात

सार्वजनिक स्थानों, शिक्षा, रोजगार आदि में बाधा रहित तरीके से साधन उपलब्ध कराना। निश्चय ही विकलांग व्यक्ति कानून के लागू होने और केन्द्र एवं राज्य की सरकारों की ओर से विकलांगता को रोकने हेतु देशभर में प्रयास के परिणामस्वरूप इस मुद्दे और विकलांगता की समस्याओं के प्रति आम लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ है और विकलांग लोग भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुए हैं। परन्तु देश में अभी भी विकलांगों को बस, ट्रेन आदि वाहनों, सार्वजनिक भवनों, शिक्षण संस्थानों, कार्यालयों आदि में प्रवेश आदि की समुचित सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। हमारी पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था कि विकलांगों को दया नहीं सहानुभूति की आवश्यकता है। उन्हें दान नहीं बल्कि अन्य मानव मित्रों की तरह अधिकार चाहिए। यह समस्या केवल कानून से हल नहीं हो सकती इसके लिए जनता के व्यवहार में परिवर्तन आवश्यक है। आज विकलांगों के प्रति समाज के दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाने की आवश्यकता है, तभी वे सामान्य जनों की तरह विकास की मुख्य धारा से जुड़कर समाज के निर्माण में सशक्त भूमिका निभाएँगे फिर एक दिन स्टीफन हॉकिंग और हेलेन एडम्स केलर की तरह शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद हमारे देश के लोग भी मानव कल्याणार्थ महान कार्य करके देश-दुनिया में अपनी विजय पताका फहराएँगे।

 

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